प्रगति
03-Jul-2009 03:26 AM
बहुत दूर से चली आ रही हूँ ये सोच कर चल रही हूँ, कि कभी न कभी, घर आएगा जी उछल जायेगा, मन मुस्काएगा, थके तन और मन, दोनों को मिलेगी एक थाह, सुस्ताने की अब प्रबल हो गयी है चाह, पर घर है कि आता ही नहीं है, बोझ थकन का मन से जाता ही नहीं है, बिना रुके लगाता
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