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यूँ ही अचानक...

देखा था तुम्हेंउगते सूरज कीनर्म उजली किरणों मेंमहसूस करा थातुम्हारा कोमल स्पर्शबारिश की रिमझिम फुहार मेंबच्चों की मासूमनिश्छल हँसी मेंसुना भी था तुम्हें, कई बारहाँ, इक बार आवाज़ दे कर बुलाया भी था सहर के वक़्त अज़ाँ में पर कभी सोचा ना थाचलते चलते अचानक इक
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भरोसा बुनियाद है ज़िन्दगी की !!!

मैं इबादत करता हूँ। नमाज़ ( सलात्) पढता हूँ, हालांकि देखा जाए तो यह सब regularly करने का discipline मुझमें नही है। मेरी कोशिश रहती है की मैं रोज़ मस्जिद जाऊँ। यह मुझे एक नई ज़िन्दगी की शुरुआत जैसा लगता है। मुझे अपने धर्म, इबादत के तौर-तरीके, और क़ुरान
 
महफूज़ अली
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