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शराफत की केंचुली

देश में मूल रूप से शराफत की दो किस्में पाई जाती हैं। एक अभी वाली, एक पुराने जमाने वाली। पुराने जमाने वाली में एक अतिरिक्त समस्या यह भी थी कि उसे लगातार ओढ़े रहना पड़ता था। लगातार ओढ़े-ओढ़े एक दिन शराफत कवच की तरह शरीर से चिपक जाती थी। फिर आदमी भले ही उसे
 
अनुज
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निंदारस का नया वर्जन

दूसरों की बुराई अर्थात निंदा करने की कला पतनातीत है। गारंटीड। न पहले जैसे परम कमीने रहे, न चरम किस्म की बुराई करने वाले। ले-देकर सब औसत लोग ही बचे हैं। हर क्षेत्र की तरह। खोखले। मुंह झुठल्ले। निंदा तक पेट से नहीं कर पाते। ऊपर से निंदा की ‘नैतिकता’ का
 
अनुज
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देश की अस्मिता वगैरहा को ललकारते हुए

इतिहास में जितने भी लोग दर्ज हुए वे हमेशा हमे प्रेरित करते रहे हैं कि भैइया तुम भी दर्ज हो। देश को महान बनाने की दिशा में तुम भी कुछ योगदान दो। ऐसी स्थिति में हम भी कभी-कभी दर्ज होने और योगदान देने के प्रति क्रियाशील हो जाते हैं। हालांकि क्रियाशीलता का
 
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भ्रष्टाचार पर एक सहज भाषण

आज में आम आदमी के अंदर छुपी हुई भ्रष्टाचारिय प्रतिभा पर भाषण देना चाहूंगा। देकर रहूंगा। कोई मुझे रोक नहीं सकता है। बड़े बोल बोलने और भाषण देने से इस देश में आज तक किसी को रोका नहीं गया है। सब अपनी बारी के इंतेजार में दम साधे खड़े रहते हैं। अत: मुझे कोई
 
अनुज
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सरकार, योजनाएं और दलदल

विकास और सशक्तिकरण हर सरकार को मंगतई मंगता है। अप्रैल वगैरह आने के बाद विकास करने की तलब खाज की तरह जानलेवा हो जाती है। सरकार का हर अंग हर विषय को खुजा-खुजाकर प्रगति-उत्थान की योजनाओं अर्थात् विकास के लिए हर संभव तरीके से तैयार करता है। योजनाएं हर सरकार
 
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‘जो जनता नईं पचा पाएगी मेवे की गुझियां’

कथा अद्भुत है। प्रसंग होली का है। किस्सा भोपाल का है। कुछ यूं है कि भंग की तरंग में डूबे सूरमा भोपाली होली पर शहर घूमने निकले हैं। तरंग में हैं सूरमा इसलिए आज हांक नहीं रहे हैं सच बोल रहे हैं। रास्ते में कहीं उनके पुराने शार्गिद बाबूभाई मिल जाते हैं।
 
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कस्बाई कवि सम्मेलन वाया फ्लैशबैक

पहले क्या कवि होते थे, क्या कविताएं होती थीं, क्या कवि सम्मेलन होते थे, कसम से। वाह...!, वाह...! ,तय करना मुश्किल होता था कि ऐसा सुनाने वालों के पहले दांत तोड़ें कि ऐसा नामुराद लिखने वालों के हाथ कि आयोजकों को ही लंगड़ा बना दें। हालांकि तीनों में से यादा
 
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स्वार्थों के होते मेहमान-हिंदी शायरी

चेहरे पर है दिखावटी मुस्कान नहीं होता नीयत का भान बदन पर हैं जगमगाते वस्त्र धारण किए दिल में काली नियत लिए भरोसे के लिए निकल रहे हैं शब्द जुबान से निरंतर विश्वास और धोखे का मालुम नहीं अन्तर मन की आंखों से पढोगे जब उनको उनके शब्दों के अर्थों का अर्थ स
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तब बदल जायेगा परिदृश्य-हिंदी शायरी

रात्रि के शीतल पलों में चन्द्रमा की हल्की रोशनी में देह पर धवल वस्त्र चारों और बिखर रही इत्र की खुशबू हाथों में गुलाब लिए प्रेम की अभिव्यक्ति के लिए निकला है वह कितना सुन्दर लगता है दृश्य पर जब सूरज चमकेगा अपनी अग्नि से धरती को प्रज्जवलित करेगा अपनी
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व्यंग्य को आलोचना की बैसाखी की जरूरत नहीं- के.पी. सक्सेना

हिन्दी व्यंग्य एवं आलोचना पर राष्ट्रीय संगोष्ठी सम्पन्न लखनऊ, 30 नवम्बर। हिन्दी व्यंग्य साहित्यिक आलोचना की परिधि से बाहर है? इस विषय पर आज उत्तर प्रदेश भाषा संस्थान और माध्यम साहित्यिक संस्थान की ओर से अट्टहास समारोह के अन्तर्गत आयोजित दो दिवसीय विच
 
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एक डिस्टर्ब्ड जिन्न

रात के दस बज चुके तो मैंने चैन की सांस ली कि चलो भगवान की दया से आज कोई पड़ोसी कुछ लेने नहीं आया। भगवान का धन्यवाद कम्प्लीट करने ही वाला था कि दरवाजे पर दस्तक हुई, एक बार, दो बार, तीन बार। लो भाई साहब, अपने गांव की कहावत है कि पड़ोसी को याद करो और पड़ोस
 
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आपका पेट फल

मेषः- आपने जो कुछ पिछले कई महीनों से पेट काट कर जमा किया है अब उसे मन मसोस कर आटे दाल पर खर्च करना ही होगा। आपको भीतर ही भीतर किसी मेहमान के आने की चिंता हर पल सताएगी। इस चिंता के कारण न तो आप दिन में जागे रह सकेंगे और न ही रात को घर वालों को चैन से
 
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महंगाई नियरे राखिए,संसद कुटि छवाई

अंग्रेजी-कार्टून का हिन्दी अनुवाद । स्रोत- केगलकार्टून्स । अनुवादक- शैलेश भारतवासी महंगाई में बंस गरीब का, हो गई अब कमाल। राम रहीम को छोड़ के, घर में सब बेहाल। थाली घर घर में फिरे, जीभ मरी मुख माहीं। दाल भात चहुं दिसि दिखे, पर पेट तो कछु नाहीं। जो दा
 
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नो हींदी नो हींदी नो हींदी!!

अब आप को अपणे बारे में क्या क्या बताऊं? बस इतणा जाण लेओ कि मैं अपणी जिंदगी में जो कुछ भी आज तक बणा दुर्घटणावस ही बणा। मैं पति नहीं होणा चाता था। पर हो गया ! मैं चोर होणा चाता था पर मास्टर होणा नहीं चाता था। वो तो चुणाव में अपणे नेता जी के पोस्टर लगाए
 
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मुहल्ले वालो, मुबारकां!!

वे हाव भाव से पूरे के पूरे सरकारी बंदे ही लग रहे थे। उन पांच में से एक ने कंधे पर एक टूटी कुदाल ली थी तो दूसरे ने बिना हथ्थी का बेलचा उठाया हुआ था। तीन जनों ने पैंट में हाथ डाले हुए थे। उन्होंने गुनगुनाते हुए, कमर मटकाते हुए मुहल्ले में एंट्री मारी त
 
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आज के मास्साब और छात्र-एक चिंतन

क्लास को पढ़ाने वाला मास्साब होता है। क्लास में पढ़ने वाला छात्र होता है। पढ़ाना कला है, पढ़ना कलाकारी। पढ़ने और पढ़ाने के बीच संबंध कालाबाजी का होता है। मास्साब को लगता है कि वो पढ़ा रहा है। छात्रों को लगता है कि वे पढ़ रहे हैं। दोनों वर्ग इस उद्यम
 
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प्यार और पाठ्यक्रम...

अथक प्रयास हुए तो प्यार हो गया। जेब भरी रही तो प्यार कुलांचे मारता रहा। गाड़ी में पेट्रोल रहा तो प्यार लांग ड्राइव पर भी जाता रहा। रेस्त्रां में फ्रेंड सर्किल से भी इंट्रोडच्यूस करवाया जाता रहा। आजकल प्यार कुछ उदास है। घर से मनीआर्डर नहीं आया है। प्य
 
अनुज
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कुछ ऐसा है, हमारी हार का गहन दर्शन भिया..

और लो साहब, अगर-मगर के साथ हम लगभग चैंपियन ट्राफी से हारकर बाहर हो गए। एक बोझ सा उतर गया। टीम से अपेक्षाओं का, देशवासियों पर से टीम को जिताने के लिए टीवी के सामने जुटे रहने का। अब दोनों ही गमगीन रहने के खेल में लगे हैं। खिलाड़ी तो फिर भी 10-12 एड, कु
 
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कुछ ऐसा है, हमारी हार का गहन दर्शन भिया..

और लो साहब, अगर-मगर के साथ हम लगभग चैंपियन ट्राफी से हारकर बाहर हो गए। एक बोझ सा उतर गया। टीम से अपेक्षाओं का, देशवासियों पर से टीम को जिताने के लिए टीवी के सामने जुटे रहने का। अब दोनों ही गमगीन रहने के खेल में लगे हैं। खिलाड़ी तो फिर भी 10-12 एड, कु
 
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एक आधुनिक मनीषी ने जब गृहत्याग किया?

सांसारिकता से उनका मन उचट गया है। वे कई दिनों से गृहत्याग की तैयारियों में लगे हैं। गृहत्याग से लेकर आत्मज्ञान और जनकल्याण तक उनके पास संन्यास का पूरा ब्लू प्रिंट तैयार है। एक दिव्य रात्रि को, दिव्य घड़ी में, दिव्य बोतल के घूंट पे घूंट उतारते हुए, दि
 
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पद न जाये -

- विनोद विप्लवपुराने समय में जब प्राणों का उतना महत्व नहीं था और जब पद नाम की अमूल्य धरोहर का अविर्भाव नहीं हुआ था, तब लोग अपने वचन की रक्षा के लिये फटाफट प्राण त्याग दिया करते थे। रामायण, महाभारत और अन्य प्राचीन ग्रंथों में ऐसे उदाहरणों की भरमार है। उस
 
विप्लव
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ओबामा और गांधीजी का भोजन

व्यंग्यओबामा और गांधीजीवीरेन्द्र जैनओबामाजी ने कहा है कि वे गांधीजी का बहुत सम्मान करते हैं और अगर अवसर मिला होता तो वे उनके साथ खाना खाना चाहते थे। उर्दू का एक शेर है- हमने किये गुनाह तो दोजख(नर्क) हमें मिली दोजख की क्या खता थी जो दोजख को हम मिलेओबामा
 
वीरेन्द्र जैन
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धन्य धन्य यह लोक तंत्र

धन्य धन्य यह लोक तंत्र-भारत का लोक तंत्र दुनिया का बड़ा लोक तंत्र है। केवल भौगोलिक दृष्टि से ही नहीं, सैद्धांतिक दृष्टि से भी। यहाँ का लोक तंत्र कुछ मूल भूत सिद्धान्तों पर चलता है। पहला यह कि यहाँ जन प्रतिनिधि बनने के लिए यदि कोई योग्यता निर्धारित है तो
 
विनय ओझा 'स्नेहिल'
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बादलों से विनय, बरस जाओ, पकौड़ों की खातिर..

इधर कईयक दिनों से मेरी बादलों पर नजर है। नजर इसलिए है कि इधर वे बरसें, उधर मैं पकौड़े खाऊं। बादलों और पकौड़ों का बड़ा गहन संबंध है। बिलकुल वैसा ही जैसा घोड़े का चने, चने का बेसन, बेसन का पकौड़ों से होता है, जन्म-जन्मांतरों का। बारिश के दिनों में ये संबंध
 
अनुज
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व्यंग्य- हे मक्खन, तू जिंदाबाद !!

जनाब मुझसे मिलिए! मैं हूं अबस विभाग का छत्रपति साहब!घूमती कुर्सी पर बैठ सभी को अपने आगे-पीछे घुमानेवाला। यार-दोस्तों, सगे-संबंधियों की घर में लिस्ट बना सुबह दफ्तर आते ही दफ्तर के फोन से उन्हें फोन पर फोन कर चैन पाने वाला। हमेशा सभी को आदेश देने वाला!
 
नियंत्रक । Admin
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हवा बांधने का दौर

व्यंग्य हवा बाँधने का दौर वीरेन्द्र जैन तुलसी बाबा कह गये हैं कि- क्षिति जल पावक गगन समीरा पंचतत्व मिल बना शरीरा! इन पंच तत्वों से ही मिल कर शरीर बनता है। इनमें से एक तत्व अथार्त पावक की बहुतायत से ये सारे तत्व विखंडित होकर अपने अपने घरों को लौट जाते
 
virendra jain
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