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बचपन प्यार और गोबर

बचपन में हम पर्याप्त मात्रा में छोटे एवं भारी तदाद में मासूम पाए जातेथे। हालांकि मोहल्लेवालों के विचार भी हमसे पर्याप्त मात्रा में अलग थे।रिश्तेदारों को हमारे इस मासूम वाले भाग पर भयंकर आपत्ति थी। उनकीआपत्ति हम आज तक दूर नहीं कर पाए हैं। एकाध बार किसी के
 
अनुज
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हाय रे टिकट -व्यंग

देश की सबसे बड़ी पंचायत के चुनाव होने थे। एक प्रतिष्ठित राजनैतिक पार्टी की तैयारी एक साल पहले ही प्रारंभ हो गई थी। विभिन्न क्षेत्रों से हजारों उम्मीदवारों के आवेदन चुनाव लड़ने के लिए पार्टी कार्यालय में जमा होने लगे थे।
 
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परमार्थ के लिए हारी टीम इंडिया

और लो साहब, अगर-मगर के साथ हम टी-20 वर्ल्डकप से हारकर बाहर हो गए। एक बोझ सा उतर गया। टीम से अपेक्षाओं का, देशवासियों पर से टीम को जिताने के लिए टीवी के सामने जुटे रहने का। अब दोनों ही गमगीन रहने के खेल में लगे हैं।खिलाड़ी तो फिर भी 10-12 एड, कुछ रियलटी
 
अनुज
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पश्चिम को हमारी देन

हम प्राचीनकाल से ही पश्चिमी मुल्कों को कुछ न कुछ देते चले आ रहे हैं। उस दिशा में हमारी ढेरों देनें हैं। जैसे पहले भारत जगतगुरु रहा है। कब रहा है ठीक-ठीक कालखंड का अंदाजा नहीं है। लेकिन रहा है। किताबों में लिखा है। अक्षर झूठ नहीं बोलते हैं, वगैरहा। तो जब
 
अनुज
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राजनीति की ‘हाईटेक रणनीति’

--अनुज खरेहाईटेक होना, खालिस हाईटेक होना है, बस। आदमी बैठे-ठाले कुछ नहीं कर रहा तो हाईटेक हो ही सकता है। गांठ से कुछ जाता नहीं। हाईटेक होने के कई फायदे हैं। चूंकि हाईटेक होने की एक हाईक्वालिटी ये भी है कि समस्याएं खत्म हो जाती हैं। आप खास हो जाते हैं, आम
 
अनुज
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स्विस बैंक का तोता और देसी अभियान

स्विस बैंक हमारे लिए फंतासी है। मिस्ट्री है। चंद्रकांता संतति है। विक्रम वेताल है। अलीबाबा चालीस चोर है। खुल जा सिमसिम है। ना जानें क्या-क्या है। दशकों से यह शब्द हर भारतीय को झकझोर रहा है। हमारी कल्पनाओं में इसकी भव्य इमारत विचरती रहती है। किसी अंधेरे
 
अनुज
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वक़्त वक़्त कि बात है

कल हमारी बेटी के स्कूल में पेरेंट्स मीटिंग थी ..,जब हम वहाँ पहुंचे तो देखा कि अजब ही दृश्य था ...एक हॉल में कचहरी की तरह लगीं कुर्सी- मेज़ और खचाखच भरे लोग ..आप उसे सभ्य मच्छी बाजार कह सकते हैं .हर पेरेंट को एक -एक विषय के लिए सिर्फ पांच मिनट पहले से ही
 
shikha varshney
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दास्तान - ए - लोकतंत्र

व्यंग कथा - उस बस्ती से बाहर जाने वाले रास्ते पर एक विशाल पत्थर पड़ा था ! बस्ती वालों ने कई बार सरकारी संस्थाओं से गुहार की थी कि उस पत्थर को हटा दिया जाए क्यूंकि उससे आम जनता को बड़ी परेशानी होती है , लेकिन जैसा कि सरकारी काम काज में हमेशा होता है ,
 
प्रकाश गोविन्द
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करवा चौथ बदलते परिवेश में

करवा चौथ - ये त्योहार उत्तर भारत में बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है.और भई मनाया भी क्यों न जाये आखिर एक महिने पहले से तैयारियाँ जो शुरु हो जाती हैं..शुरुआत होती है धर्मपत्नी के तानो से, कि, देखो जी mrs शर्मा १०,००० कि साड़ी लाई हैं इस बार, सुनो जी पड़ोसन
 
shikha varshney
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