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दिल मगर कम किसी से मिलता है... बड़े हीं पेंचो-खम हैं इश्क़ की राहो में, यही बता रहे हैं जिगर आबिदा

महफ़िल-ए-ग़ज़ल #८८"को"कोई अच्छा इनसान ही अच्छा शायर हो सकता है।" ’जिगर’ मुरादाबादी का यह कथन किसी दूसरे शायर पर लागू हो या न हो, स्वयं उन पर बिलकुल ठीक बैठता है। यों ऊपरी नज़र डालने पर इस कथन में मतभेद की गुंजाइश कम ही नज़र आती है लेकिन इसको क्या किया
 
विश्व दीपक
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ग़ज़ल का साज़ उठाओ बड़ी उदास है रात.. फ़िराक़ के ग़मों को दूर करने के लिए बुलाए गए हैं गज़लजीत जगजीत सिंह

महफ़िल-ए-ग़ज़ल #८७आज हम जिस शायर की ग़ज़ल से रूबरू होने जा रहे हैं, उन्हें समझना न सिर्फ़ औरों को लिए बल्कि खुद उनके लिए मुश्किल का काम है/था। कहते हैं ना "पल में तोला पल में माशा"... तो यहाँ भी माज़रा कुछ-कुछ वैसा हीं है। एक-पल में हँसी-मज़ाक से लबरेज
 
विश्व दीपक
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तारीखें तारीक सही..

तारीखें तारीक सही,उम्मीदें बारीक सही.....तालु से तलवों में उतरीअपनी हर तहरीक सही... पर हम सब काहाल-ओ-मुस्तकबिलतब हीं तो काबिल होगा,जबमाज़ी के मरघट का यारोंहर दिल हीं कातिल होगा...जबमौज़ूं हर मेहनत होगीऔर हौसला भी कामिल होगा..इसहिन्द के सख्त सफ़ीने काजो
 
विश्व दीपक
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रुस्तम सौ, सोहराब हज़ारों रखती है.

आँखों में असबाब हज़ारों रखती है, वो लड़की जो ख्वाब हज़ारों रखती है.... रोती है, जब चाँद सिकुड़ता थोड़ा भी,पर खुद हीं आफ़ताब हज़ारों रखती है.... क्या जाने, क्यों होठों पे सौ रंग भरे, जब उन में गुलाब हज़ारों रखती है..मैं क्या हूँ! गर्वीली अपने कदमों
 
विश्व दीपक
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सो ना हीं लूँ तो है सही..

नाम लिया तो बदनाम हो जाऊँगा.. सो ना हीं लूँ तो है सही.. क्योंकिउसकी लटों से फ़ँसके मैं, उसकी लतों से हँसके मैं गुजरा अगर जो सामने दुनिया के, उसको थामनेतो जानता हूँ पाक़-साफ़इस जहां कीतंग-सी हर एक गली मेइश्क़ के मैं नाम परदुश्नाम(गली) हो जाऊँगा.बदनाम हो
 
विश्व दीपक
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तो बड़ा शायर हूँ..

मैं चाँद को दरीचों में उतारूँ तो बड़ा शायर हूँ,मैं रात से गलीचों को सवारूँ तो बड़ा शायर हूँ,मैं ख़्वाब में तारों की पनाह लूँ तो बड़ा शायर हूँ,मैं आग से साँसों की निबाह लूँ तो बड़ा शायर हूँ,मैं रूह की ये राख उड़ा दूँ तो बड़ा शायर हूँ,मैं जिस्म की हर फ़ाँक
 
विश्व दीपक
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साढे साती

मुझे डर था बस इसी बात का,कि ये हश्र न हो मुलाकात का।तूने मन को मार के क्या पाया,बुझा ध्रुवतारा तेरी रात का।हँसी अब जो काटती है तुझको,है ये असर नेक ख्यालात का।वो जो किस्मत बाँटते हैं उनके,शनि घर में है साढे सात का।जिसे कमतर आँकते थे सारे,वो था अंतर शह और
 
विश्व दीपक
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लिच्छवि की एक छवि लेकर..

लिच्छवि की एक छवि लेकर गणतंत्र गढा, शिरोधार्य है ये,पर कोस-कोस पर आम्रपाली, तुम कहो, तुम्हें स्वीकार्य है ये?वो आम्रपाली थी नगरवधू, मूल अधिकारों से वंचित थी,पर दलित न थी, विगलित न थी, हर सुख-सुविधा से संचित थी,यौवन वह किसके नाम करे, निर्णय उसका, कोई जोर
 
विश्व दीपक
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ये तेरे इशारे..

तेरे इशारों पर रात की रिहाई हो,तेरे इशारों पर चाँद की जम्हाई हो,तेरे इशारों पर तीरगी निखर जाए,जैसे अमावस की खुलती कलाई हो।तेरे इशारे इशारे नहीं हैं,ये तिनके हैं बहते अथाह सागरों मेंजहाँ आस जीने की ज़िंदा नहीं हैन साँसें बची है, न हीं हौसले हैंन उम्मीद है
 
विश्व दीपक