पसंद करें
0
नापसंद करें

दिसम्बर की सर्दी में तेरा जाना, यार..उपेन… कुछ जँचा नहीं

दिसम्बर की सर्दी में तेरा जाना, यार..उपेन… कुछ जँचाये भिन्न-भिन्न बोलियाँ / ये लाठियाँ, ये गोलियाँयह उपेन्द्र मिश्र की कविता की पंक्तियाँ हैं। उपेन्द्र मिश्र मुझसे तक़रीबन चौदह-पन्द्रह बरस बड़ा था। लेकिन हमारी मित्रता में उम्र कभी आड़े नहीं आयी। हम जब भी
 
बिज़ूका फ़िल्म क्लब
टैग: srdhanjali