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अज़ीब शख़्स था, आँखों में ख़्वाब छोड़ गया

अज़ीब शख़्स था, आँखों में ख़्वाब छोड़ गयावो मेरी मेज़ पे, अपनी किताब छोड़ गया नज़र मिली तो अचानक झुका के वो नज़रेंमेरे सवाल के कितने जवाब छोड़ गयापलट के आने का वादा किया था, देने सकूँ मगर वो दिल में, मुसलसल अज़ाब छोड़ गयाउसे पता था, कि तन्हा न रह सकूँगी मैं वो
 
श्रद्धा जैन
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हमको भी समझ फूल या पत्थर नहीं आते

हमको भी समझ फूल या पत्थर नहीं आते दुश्मन की तरह दोस्त अगर घर नहीं आते नज़दीक बहुत तुम रहे, बन जाओ न आदतये सोच के, मिलने तुझे अक्सर नहीं आते जिस दिन से मैं ले आई हूँ बाज़ार से पिंजराउस रोज से, छज्जे पे कबूतर नहीं आते मिल जाए नया ज़ख़्म तो फिर कोई ग़ज़ल होअब
 
श्रद्धा जैन
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कोई पत्थर तो नहीं हूँ , कि ख़ुदा हो जाऊँ

कैसे मुमकिन है, ख़मोशी से फ़ना हो जाऊँकोई पत्थर तो नहीं हूँ, कि ख़ुदा हो जाऊँफ़ना = तबाह फ़ैसले सारे उसी के हैं, मिरे बाबत भी मैं तो औरत हूँ, कि राज़ी-ओ-रज़ा हो जाऊँधूप में साया, सफ़र में हूँ कबा फूलों की मैं अमावस में, सितारों की जिया हो जाऊँकबा = लिबास
 
श्रद्धा जैन
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फिर किसी से दिल लगाया जाएगा

अब नया दीपक जलाया जाएगा फिर किसी से दिल लगाया जाएगा चाँद गर साथी न मेरा बन सके साथ सूरज का निभाया जाएगा रस्म-ए-रुखसत को निभाने के लिए फूल आँखों का चढ़ाया जाएगा कर भला कितना भी दुनिया में मगर मरने पे ही बुत बनाया जाएगा आईना सूरत बदलने जब लगे ख़ुद को फ
 
श्रद्धा जैन
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मूक हमारे हो संवाद

तेरी आँखों से, मेरी आँखों तक प्यार की जब हो वार्तालाप किसी भाषा की बात न हो न हो कोई तब, जातिवाद दूर कही शहनाई बजे और बागों में खिल उठे गुलाब स्पर्श तुम्हारा बजे तरंग बन दूर कहीं जलती हो आग, एक दूजे को जाने हम जब मूक हमारे हो संवाद
 
श्रद्धा जैन