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कथा-गीत: मैं बूढा बरगद हूँ यारों... ---संजीव 'सलिल'

कथा-गीत: मैं बूढा बरगद हूँ यारों... ---संजीव 'सलिल' कथा-गीत:मैं बूढा बरगद हूँ यारों...संजीव 'सलिल' **मैं बूढा बरगद हूँ यारों...है याद कभी मैं अंकुर था. दो पल्लव लिए लजाता था. ऊँचे वृक्षों को देख-देख-मैं खुद पर ही शर्माता था. धीरे-धीरे मैं बड़ा हुआ.शाखें
 
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
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कथा-गीत: मैं बूढा बरगद हूँ यारों... ---संजीव 'सलिल'

कथा-गीत:मैं बूढा बरगद हूँ यारों...संजीव 'सलिल' **मैं बूढा बरगद हूँ यारों...है याद कभी मैं अंकुर था. दो पल्लव लिए लजाता था. ऊँचे वृक्षों को देख-देख-मैं खुद पर ही शर्माता था. धीरे-धीरे मैं बड़ा हुआ.शाखें फैलीं, पंछी आये.कुछ जल्दी छोड़ गए मुझको-कुछ बना
 
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
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तितलियाँ : कुछ अश'आर संजीव 'सलिल'

 तितलियाँ : कुछ अश'आर संजीव 'सलिल'तितलियाँ जां निसार कर देंगीं.हम चराग-ए-रौशनी तो बन जाएँ..*तितलियों की चाह में दौड़ो न तुम.फूल बन महको तो खुद आयेंगी ये..*तितलियों को देख भँवरे ने कहा. भटकतीं दर-दर न क्यों एक घर किया?कहा तितली ने मिले सब दिल
 
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दोहा का रंग भोजपुरी के संग: संजीव वर्मा 'सलिल'

दोहा का रंग भोजपुरी के संग:संजीव वर्मा 'सलिल'सोना दहल अगनि में, जैसे होल सुवर्ण.भाव बिम्ब कल्पना छुअल, आखर भयल सुपर्ण..*सरस सरल जब-जब भयल, 'सलिल' भाव-अनुरक्ति.तब-तब पाठक गणकहल, इहै काव्य अभिव्यक्ति.. *पीर पिये अउ प्यार दे, इहै सृजन के रीत.अंतर से अंतर
 
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भोजपुरी दोहे: संजीव 'सलिल'

भोजपुरी दोहे:संजीव 'सलिल'*नेह-छोह रखाब सदा, आपन मन के जोश.सत्ता दान बल पाइ त, 'सलिल; न छाँड़ब होश..*कइसे बिसरब नियति के, मन में लगल कचोट.खरे-खरे पीछे रहल, आगे आइल खोट..*जीए के सहरा गइल, आरच्छन के हाथ.अनदेखी काबलियत कs, लख- हरि पीटल माथ..*आस बन गइल सांस
 
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मातृ दिवस पर स्मृति गीत: माँ की सुधियाँ पुरवाई सी.... संजीव 'सलिल'

मातृ दिवस पर स्मृति गीत: माँ की सुधियाँ  पुरवाई सी....संजीव 'सलिल'*तन पुलकित मन प्रमुदित करतीं माँ की सुधियाँ  पुरवाई सीतुमको खोकर खुद को खोया, संभव कभी न भरपाई सी ...  *दूर रहा जो उसे खलिश है तुमको देख नहीं वह पाया.निकट रहा मैं
 
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मातृ दिवस पर स्मृति गीत: माँ की सुधियाँ पुरवाई सी.... संजीव 'सलिल'

मातृ दिवस पर स्मृति गीत:divyanarmada.blogspot.com माँ की सुधियाँ  पुरवाई सी....संजीव 'सलिल'*तन पुलकित मन प्रमुदित करतीं माँ की सुधियाँ  पुरवाई सीतुमको खोकर खुद को खोया, संभव कभी न भरपाई सी ...  *दूर रहा जो उसे खलिश है तुमको देख
 
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मातृ दिवस पर स्मृति गीत: माँ की सुधियाँ पुरवाई सी.... संजीव 'सलिल'

माँ की सुधियाँ  पुरवाई सी....संजीव 'सलिल'*तन पुलकित मन प्रमुदित करतीं माँ की सुधियाँ  पुरवाई सीतुमको खोकर खुद को खोया, संभव कभी न भरपाई सी ...  *दूर रहा जो उसे खलिश है तुमको देख नहीं वह पाया.निकट रहा मैं लेकिन बेबस रस्ता छेक नहीं
 
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गीत: समर ठन गया... --संजीव 'सलिल'

 गीत:समर ठन गया... संजीव 'सलिल' * तुमने दंड दिया था मुझको, लेकिन वह वरदान बन गया. दैव दिया जब पुरस्कार तो, अपनों से ही समर ठन गया... * तुम लक्ष्मी के रहे पुजारी, मुझे शारदा-पूजन भाया. तुम हर अवसर रहे भुनाते, मैंने दामन स्वच्छ बचाया. चाह तुम्हारी हुई
 
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गीत: देश पे जान लुटाएंगे...... ---आचार्य संजीव 'सलिल'

जियें देश के लिए हमेशा, देश पे जान लुटाएंगे......*गुरु अफजल हों या कसाब हो,अपराधी हत्यारे हैं.द्रोही हैं ये राष्ट्र-धर्म के, ज़हर बुझे दोधारे हैं..पालेंगे हम अगर इन्हें तो, निश्चय ही पछतायेंगे-बोझ धरा का दें उतार, धरती पर स्वर्ग बसायेंगे.पाक बना नापाक
 
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तेवरी : बाँहों में साँप रहे पाल ----'सलिल'.

  तेवरीबाँहों में साँप रहे पालसंजीव वर्मा 'सलिल'*बाँहों में साँप रहे पाल.और कहें मौत रहे टाल.. नक्सल-आतंक सहें मौन.सत्ता पर कुरबां कर लाल..नीतियाँ-सिद्धांत बन गएदोरंगे नेता की ढाल..दुश्मन हैं अपने हम खुदकैसे फिर सुधरेंगे हाल?नेता-सुत पुलिस में न
 
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मुक्तिका: शहर की आवाज़ --संजीव 'सलिल'

मुक्तिका:शहर की आवाज़ संजीव 'सलिल' *आइये! मिलकर सुनें, हर शहर की आवाज़.जो सुनें उसको गुनें, बन शहर की आवाज़..क्या घटा?, क्या घट रहा है?, कल घटेगा क्या?सिर न धुनें, जान लें, सुन शहर की आवाज़..शुभ-अशुभ अच्छा-बुरा, जो चाह वह चुन लें.लगे अपना देश सुन्दर, शहर
 
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गीत: समर ठन गया... --संजीव 'सलिल'

 गीत:समर ठन गया... संजीव 'सलिल' * तुमने दंड दिया था मुझको, लेकिन वह वरदान बन गया. दैव दिया जब पुरस्कार तो, अपनों से ही समर ठन गया... * तुम लक्ष्मी के रहे पुजारी, मुझे शारदा-पूजन भाया. तुम हर अवसर रहे भुनाते, मैंने दामन स्वच्छ बचाया. चाह तुम्हारी हुई
 
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रासलीला : संजीव 'सलिल'

रासलीला :संजीव 'सलिल' *आँख में सपने सुनहरे झूलते हैं. रूप लख भँवरे स्वयं को भूलते हैं.झूमती लट नर्तकी सी डोलती है.फिजा में रस फागुनी चुप घोलती है.कपोलों की लालिमा प्राची हुई है.कुन्तलों की कालिमा नागिन मुई है.अधर शतदल पाँखुरी से रसभरे हैं.नासिका
 
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नवगीत: मत हो राम अधीर...... --संजीव 'सलिल'

*जीवन के सुख-दुःख हँस झेलो ,मत हो राम अधीर.....*भाव, आभाव, प्रभाव ज़िन्दगी.मिल्न, विरह, अलगाव जिंदगी.अनिल अनल परस नभ पानी-पा, खो, बिसर स्वभाव ज़िन्दगी.अवध रहोया तजो, तुम्हें तो सहनी होगी पीर.....*मत वामन हो, तुम विराट हो.ढाबे सम्मुख बिछी खाट हो.संग कबीरा
 
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क्षणिकाएँ... संजीव 'सलिल'

क्षणिकाएँ...संजीव 'सलिल'*कर पाता दिलअगर वंदनातो न टूटतायह तय है.*निंदा करनाबहुत सरल है.समाधान हीमुश्किल है.*असंतोष-कुंठाकब उपजे?बूझे कारण कौन?'सलिल' सियासतस्वार्थ साधतीजनगण रहता मौन.*मैं हूँ अदनाशब्द-सिपाही.अर्थ सहित देंशब्द गवाही..*
 
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क्षणिकाएँ... संजीव 'सलिल'

क्षणिकाएँ...संजीव 'सलिल' *कर पाता दिल अगर वंदना तो न टूटता यह तय है. *निंदा करना बहुत सरल है.समाधान ही मुश्किल है.*असंतोष-कुंठाकब उपजे?बूझे कारण कौन?'सलिल' सियासतस्वार्थ साधती जनगण रहता मौन.*मैं हूँ अदना शब्द-सिपाही.अर्थ सहित देंशब्द गवाही..*Acharya
 
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दोहे आँख के... संजीव 'सलिल'

दोहे आँख के...संजीव 'सलिल'कही कहानी आँख की, मिला आँख से आँख.आँख दिखाकर आँख को, बढ़ी आँख की साख..आँख-आँख में डूबकर, बसी आँख में मौन.आँख-आँख से लड़ पड़ी, कहो जयी है कौन?आँख फूटती तो नहीं, आँख कर सके बात.तारा बन जा आँख का, 'सलिल' मिली सौगात..कौन किरकिरी आँख
 
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भोजपुरी दोहे: संजीव 'सलिल'

भोजपुरी दोहे:संजीव 'सलिल' रूप धधा के मोर जस, नचली सहरी नार.गोड़ देख ली छा गइल, घिरना- भागा यार..*बाग़-बगीचा जाई के, खाइल पाकल आम.साझे के सेनुरिहवा, मीठ लगल बिन दाम..*अजबे चम्मक आँखि में, जे पानी हिलकोर.कंव राजकुमार के, कथा कहsसु जे लोर..*कहतानी नीमन
 
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नव गीत: जीवन की जय बोल..... --संजीव 'सलिल'

नव गीत संजीव 'सलिल'* जीवन की जय बोल, धरा का दर्द तनिक सुन...           तपता सूरज            आँख दिखाता,
 
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छत्तीसगढ़ी में दोहा: --संजीव 'सलिल'

छत्तीसगढ़ी में दोहा: --संजीव 'सलिल' हमर देस के गाँव मा, सुन्हा सुरुज विहान.अरघ देहे बद अंजुरी, रीती रोय  किसान..जिनगानी के समंदर, गाँव-गँवई के रीत. जिनगी गुजरत हे 'सलिल', कुरिया-कुंदरा मीत..महतारी भुइयाँ असल, बंदत हौं दिन-रात.दाई! पैयाँ
 
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नवगीत: करो बुवाई... --संजीव 'सलिल'

नवगीत:करो बुवाई...खेत गोड़करकरो बुवाई...*ऊसर-बंजर जमीन कड़ी है.मँहगाई जी-जाल बड़ी है.सच मुश्किल की आई घड़ी है.नहीं पीर की कोई जडी है.अब कोशिश कीहो पहुनाई.खेत गोड़करकरो बुवाई...*उगा खरपतवार कंटीला.महका महुआ मदिर नशीला.हुआ भोथरा कोशिश-कीला.श्रम से कर धरती को
 
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द्विपदी ग़ज़ल: ...बाँच सके तो बाँच. --संजीव 'सलिल'

सत्य सनातन नर्मदा, बाँच सके तो बाँच.मिथ्या सब मिट जाएगा, शेष रहेगा साँच..कथनी-करनी में तनिक, रखना कभी न भेद.जो बोया मिलता वही, ले कर्मों को जाँच..साँसें अपनी मोम हैं, आसें तपती आग.सच फौलादी कर्म ही सह पाता है आँच..उसकी लाठी में नहीं, होती है आवाज़.देख न
 
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गीतिका: कद छोटा परछाईं बड़ी है... ---आचार्य संजीव 'सलिल'

गीतिकासंजीव 'सलिल'कद छोटा परछाईं बड़ी है.कैसी मुश्किल आई घड़ी है.चोर कर रहे पहरेदारीसच में सच रुसवाई बड़ी है..बीवी बैठी कोष सम्हालेखाली हाथों माई खड़ी है..खुद पर खर्च रहे हैं लाखोंभिक्षुक हेतु न पाई पडी है..'सलिल' सांस-सरहद पर चुप्पीमौत शीश पर आई-अड़ी
 
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नव गीत: मीत तुम्हारी राह हेरता... --संजीव 'सलिल'

गीतमीत तुम्हारी राह हेरता...संजीव 'सलिल'*मीत तुम्हारी राह हेरता...*सुधियों के उपवन में तुमनेवासंती शत सुमन खिलाये.विकल अकेले प्राण देखकर-भ्रमर बने तुम, गीत सुनाये.चाह जगा कर आह हुए गुममूँदे नयन दरश करते हम-आँख खुली तो तुम्हें न पाकरमन बौराये, तन
 
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नव गीत: रंगों का नव पर्व बसंती --संजीव 'सलिल'

नव गीतसंजीव 'सलिल'*रंगों का नव पर्व बसंतीसतरंगा आया.सद्भावों के जंगल गायबपर्वत पछताया...*आशा पंछी को खोजे सेठौर नहीं मिलती.महानगर में शिव-पूजन कोबौर नहीं मिलती.चकित अपर्णा देख, अपर्णाहै भू की काया.सद्भावों के जंगल गायबपर्वत पछताया...*कागा-कोयल का अंतर
 
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भोजपुरी में हाइकु: संजीव 'सलिल'

(मूलतः जापानी छंद: ३ पद, वर्ण या अक्षर क्रमशः ५, ७, ५. मात्रा या तुक बंधन नहीं.)१.श्रम करलनियमित रहलआगे बढ़ल..*२.कबोs थाकततोहार इयाद हीहोइ ताकत..*३.विलग न होखेअइसन विश्वासतोहरा आभास..*४.आगे का होइईश्वर तू ही जानsआशा न खोई..*५.मन कागज़इयाद रोशनाईलिखल
 
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गीतिका: बिना नाव पतवार हुए हैं... ---आचार्य संजीव 'सलिल'

गीतसंजीव 'सलिल'*वक़्त ने दिल को दिए हैंघाव कितने?...*हम समझ ही नहीं पाएकौन क्या है?और तुमने यह न समझा मौन क्या है?साथ रहकर भी रहे क्योंदूर हरदम?कौन जाने हैं अजानेभाव कितने?वक़्त ने दिल को दिए हैंघाव कितने?...*चाहकर भी तुम न हमकोचाह पाए.दाहकर भी हम न
 
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हाइकु ग़ज़ल: आया वसंत............ संजीव 'सलिल'

हाइकु ग़ज़लआया वसंत, / इन्द्रधनुषी हुए / दिशा-दिगंत..शोभा अनंत / हुए मोहित, सुर / मानव संत..*प्रीत के गीत / गुनगुनाती धूप / बनालो मीत.जलाते दिए / एक-दूजे के लिए / कामिनी-कंत..*पीताभी पर्ण / संभावित जननी / जैसे विवर्ण..हो हरियाली / मिलेगी खुशहाली / होगे
 
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हाइकु ग़ज़ल: आया वसंत............ संजीव 'सलिल'

आया वसंत, / इन्द्रधनुषी हुए / दिशा-दिगंत..शोभा अनंत / हुए मोहित, सुर / मानव संत..*प्रीत के गीत / गुनगुनाती धूप / बनालो मीत.जलाते दिए / एक-दूजे के लिए / कामिनी-कंत..*पीताभी पर्ण / संभावित जननी / जैसे विवर्ण..हो हरियाली / मिलेगी खुशहाली / होगे
 
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दोहे- नोट महात्म्य : संजीव 'सलिल'

मायावती जी को नोटों की माला पहनाई जाने पर--दोहे- नोट महात्म्य : संजीव 'सलिल' नोटों की माला पहन, लड़िये आम चुनाव.नोट लुटा कर वोट लें, बढ़ा रहेगा भाव..'सलिल' नोट के हार से, हुई हार भी जीत.जो न रहे पहचानते, वे बन बैठे मीत..गधा नोट-माला पहिन, मिले- बोलिए
 
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नवगीत : चूहा झाँक रहा हंडी में... --संजीव 'सलिल'

*चूहा झाँक रहा हंडी में,लेकिन पाई सिर्फ हताशा...*मेहनतकश के हाथ हमेशारहते हैं क्यों खाली-खाली?मोती तोंदों के महलों में-क्यों बसंत लाता खुशहाली?ऊँची कुर्सीवाले पातेअपने मुँह में सदा बताशा.चूहा झाँक रहा हंडी में,लेकिन पाई सिर्फ हताशा...*भरी तिजोरी फिर भी
 
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नवगीत: बजा बाँसुरी ---संजीव 'सलिल'

*बजा बाँसुरीझूम-झूम मन...*जंगल-जंगलगमक रहा है.महुआ फूलामहक रहा है.बौराया हैआम दशहरी-पिक कूकी, चितचहक रहा है.डगर-डगर परछाया फागुन...*पियराई सरसोंजवान है.मनसिज तानेशर-कमान है.दिनकर छेड़ेउषा लजाई-प्रेम-साक्षीचुप मचान है.बैरन पायलकरती गायन...*रतिपति बिन
 
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नवगीत: ऊषा को लिए बाँह में ---संजीव 'सलिल'

नव गीत:ऊषा को लिए बाँह मेंसंजीव 'सलिल'*ऊषा को लिए बाँह में,संध्या को चाह में.सूरज सुलग रहा है-रजनी के दाह में...*पानी के बुलबुलों सीआशाएँ पल रहीं.इच्छाएँ हौसलों कोदिन-रात छल रहीं.पग थक रहे, मंजिलकहीं पाई न राह में.सूरज सुलग रहा है-रजनी के दाह
 
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गीत: ओ! मेरे प्यारे अरमानों --संजीव 'सलिल'

गीत:ओ! मेरे प्यारे अरमानोंसंजीव 'सलिल'*ओ! मेरे प्यारे अरमानों,आओ, तुम पर जान लुटाऊँ.ओ! मेरे सपनों अनजानों-तुमको मैं साकार बनाऊँ...*मैं हूँ पंख उड़ान तुम्हीं हो,मैं हूँ खेत, मचान तुम्हीं हो.मैं हूँ स्वर, सरगम हो तुम ही-मैं अक्षर हूँ गान तुम्हीं हो.ओ! मेरी
 
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गीतिका: भुज पाशों में कसता क्या है? --संजीव 'सलिल

गीतिकासंजीव 'सलिल'भुज पाशों में कसता क्या है?अंतर्मन में बसता क्या है?जितना चाहा फेंक निकालूँउतना भीतर धँसता क्या है?ऊपर से तो ठीक-ठाक हैभीतर-भीतर रिसता क्या है?दिल ही दिल में रो लेता है.फिर होठों से हँसता क्या है?दाने हुए नसीब न जिनकोउनके घर में पिसता
 
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नवगीत : चूहा झाँक रहा हंडी में... --संजीव 'सलिल'

नवगीत :चूहा झाँक रहा हंडी में...संजीव 'सलिल'*चूहा झाँक रहा हंडी में,लेकिन पाई सिर्फ हताशा...*मेहनतकश के हाथ हमेशारहते हैं क्यों खाली-खाली?मोती तोंदों के महलों में-क्यों बसंत लाता खुशहाली?ऊँची कुर्सीवाले पातेअपने मुँह में सदा बताशा.चूहा झाँक रहा हंडी
 
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गीत : किस तरह आये बसंत?... --संजीव 'सलिल'

गीत :किस तरह आये बसंत?...मानव लूट रहा प्रकृति कोकिस तरह आये बसंत?...*होरी कैसे छाये टपरिया?,धनिया कैसे भरे गगरिया?गाँव लीलकर हँसे नगरिया.राजमार्ग बन गयी डगरिया.राधा को छल रहा सँवरिया.अंतर्मन रो रहा निरंतरकिस तरह गाये बसंत?...*बैला-बछिया कहाँ चरायें?सूखी
 
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नवगीत: रंग हुए बदरंग --संजीव 'सलिल'

नवगीत:संजीव 'सलिल'रंग हुए बदरंग,मनाएँ कैसे होली?...*घर-घर में राजनीतिघोलती ज़हर.मतभेदों की प्रबलहर तरफ लहर.अँधियारी सांझ है,उदास है सहर.अपने ही अपनों परढा रहे कहर.गाँव जड़-विहीनपर्ण-हीन है शहर.हर कोई नेता होतो कैसे हो टोली?...*कद से भी ज्यादा हैलंबी
 
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नवगीत: आँखें रहते सूर हो गए --संजीव 'सलिल'

नवगीत;संजीव 'सलिल'*आँखें रहते सूर हो गए,जब हम खुद से दूर हो गए.खुद से खुद की भेंट हुई तो-जग-जीवन के नूर हो गए...*सबलों के आगे झुकते सब.रब के आगे झुकता है नब.वहम अहम् का मिटा सकें तो-मोह न पाते दुनिया के ढब.जब यह सत्य समझ में आया-भ्रम-मरीचिका दूर हो
 
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