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कोई बोले राम-राम कोई ख़ुदाय- दूरदर्शन के सुहाने दिनों का वो शबद

                                  ब्‍लैक एंड व्‍हाईट वाले दूरदर्शनी दौर की यादें ताज़ा हैं ज़ेहन में अब तक । इतने दिन गुज़र गए लेकिन टी.वी. देखने का वो रोमांच दोबारा
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अरोगो

‘सबद’ पूर्ण है ‘शब्द’ से। अर्थ में ‘सबद’ वेद है। नानक से लेकर नाथों ने ‘सबद’ रचे। कबीर से लेकर दादू ने ‘सबद’ गाये। कुछ ‘सबद’ विस्मृति में हैं तो कुछ वाणियों में। कहते हैं सबद यथार्थ ज्ञान का मूल है, भव है। संत सबद की इस वाणी से होना सिखाते हैं (to be)।
 
Gopal Singh
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