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संभला नहीं लेकिन...

मैं जब कहता हूँसोया नहीं कई रातों से,तुम्हें होता नहीं यकीन।मैं जब सोचता हूँघर से बाहर जाऊँ कैसे,कदम तले नहीं जमीन।मैं जब चाहता हूँभावों को पिरो दूँ कागज़ पे,शब्द मिलते नहीं जहीन।मैं जब ताकता हूँठहरे वर्तमान से पीछे,एक टुकडा नहीं सुकून.मैं तब कोसता
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