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माना तुम्हें शहर ने जगमग जगमग रातें दी होंगी

भरा-भरा सा दिन लगता है लेकिन खाली-खाली शामकहाँ गयी चौपालों वाली बतियाती मतवाली शाम घर जाने का मन होता था मन में घर आ जाता था शाम ढले ही इंतजार में खुलती खिड़की वाली शाम सारे दिन की थकन मिटाती गय्या जैसी लगती थी आँगन के पीपल के नीचे करती हुई जुगाली शाम
 
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एक मुट्ठी आसमान

रोज़ जब किसी न किसी चौराहे पर ट्रैफिक के चक्रव्यूह मेंकिसी अभिमन्यु को कटा पाता हूँ ,झेलता हूँ अपने ही आसपास खून की कै करते असंख्य लोगों को ,जब मेरे नथुने ताड़का की नाईं ज़हरीला धुयाँ उगलती चिमनियों को देख फडफडा कर दर्शाते हैं क़ि अब दम घुटने लगा है तब
 
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मेरा अपना ही क्रंदन है और अकेला मैं हूँ

मन का गहरा खालीपन है और अकेला मैं हूँ जैसे कोई निर्जन वन है और अकेला मैं हूँ जिसको सुनकर रातों को मैं अक्सर जाग गया हूँ मेरा अपना ही क्रंदन है और अकेला मैं हूँ मेरे घर के आस पास ही रहना चाँद सितारों मेरी नींदों से अनबन है और अकेला मैं हूँ पक्की करके
 
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हमेशा गाँव ही खुद को शहर में ढाल लेते हैं

मार्च माह की चौथी कविता एक ग़ज़ल है जिसे लिखा है रवीन्द्र शर्मा 'रवि' ने। रवि की ग़ज़लें हिन्द-युग्म के पाठक बहुत पसंद करते हैं। रवि एक बार हिन्द-युग्म के यूनिकवि भी रह चुके हैं।पुरस्कृत ग़ज़लगरीबी में भी बच्चे यूँ उड़ाने पाल लेते हैं ज़रा सी डाल झुक जाए
 
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भूखे-नंगे टूटे-खस्ते कितने खुश हैं

रेंग-रेंग कर चलते रस्ते कितने खुश हैं भूखे-नंगे टूटे-खस्ते कितने खुश हैं हमने इनका बचपन छीन लिया है इनसे बच्चों के कन्धों पर बस्ते कितने खुश हैं शाम हुई तो घर लौटेंगे इनमें कितने सुबह-सुबह कर रहे नमस्ते कितने खुश हैं अपने चेहरे की कालिख का किसे पता हैइक
 
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माँ-बाप में झगड़ा था असर और कहीं था

नवम्बर 2009 के यूनिकवि रवीन्द्र शर्मा 'रवि' ग़ज़ल-प्रेमी पाठकों की पहली पसंद हैं। इनके ग़ज़लें पाठकों और निर्णायकों का ध्यान एक साथ खींचतीं हैं। फरवरी 2010 की यूनिकवि प्रतियोगिता में इनकी एक ग़जल ने आठवाँ स्थान बनाया।पुरस्कृत कवितावो राह कोई और सफ़र और
 
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हमारा आम होता है तुम्हारा खास होता है

कभी खामोश लम्हों में मुझे अहसास होता है कि जैसे ज़िन्दगी भी रूह का बनवास होता है जिसे वो रौनके होने पे अक्सर भूल जाता है वही तन्हाईओं में आदमी के पास होता है सुना था दर्द होता है ग़मों का एक सा लेकिन हमारा आम होता है तुम्हारा खास होता है किसी के वास्ते
 
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पेड़ो, तुम जंगल में ही रहना

जनवरी 2010 की दूसरी कविता नवम्बर 2009 माह के यूनिकवि रह चुके रवीन्द्र शर्मा 'रवि' की है। रवि अपनी ख़ास किस्म की ग़ज़लों के लिए भी हिन्द-युग्म के पाठकों के मध्य पहचाने जाते हैं।पुरस्कृत कविता: पेड़तुमने उसी दिन रहन रख दी थी अपनी अस्मिता जिस दिन तुमने आदमी
 
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बिकाऊ शहर में हर ओर अब बाज़ार बाक़ी हैं

सभी सपने नहीं टूटे अभी दो चार बाकी हैं कहो अश्कों से आँखों में अभी अंगार बाकी हैंखुदाया ये तेरी दुनिया में इतना फर्क सा क्यों है कहीं पर भूख बाकी है कहीं ज़रदार बाकी हैंखरीदारी बची है या बचे हैं बेचने वाले बिकाऊ शहर में हर ओर अब बाज़ार बाक़ी हैंअभी भी
 
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