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बुक्का फूटा..बुक्क!!!

हमारे पास आँखे हैं तो देखने की सुविधा है. मगर हम बस दूसरों को देख सकते हैं. काश!! अपनी आँखों से हर वक्त खुद को भी देख पाते. दर्पण इज़ाद कर लिया है लेकिन दर्पण कब हमेशा साथ रहता है? दिन में एक या दो बार दर्पण देखते हैं वो भी मात्र खुद को निहारते ही हैं.
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वैल्यू ऑफ न्यूसेन्स वैल्यू

शाम हो चली. मौसम तो खैर जैसा भी हो, माकूल ही होता है पीने वालों के लिए. सर्दी हो, गरमी हो या बरसात. एक गिलास में मुश्किल से १०% स्कॉच, बाकी पूरा पानी और बर्फ (पानी ही तो है). पिओ और झूमो नशे में. सब कहते हैं शराब के नशे में है. डॉक्टर कहता है जितना हो
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तू भी मेरे ठोकरों पर हँस ले - A Thought

तू भी मेरे ठोकरों पर हँस ले ,हाथ छोर कर जो चला हु तेरा !परेशा ना हो  मेरी गिरते सम्हलते कदमो पर ,कदम जब बढ़ा ही दिया अब चल परेगा ही ये सिलसिला ! !खवाहिश ही कब की मंजिलो को नापने की , बस चला हूँ .. और चलता रहे ये काफिला ! !रचना : सुजीत कुमार लक्की
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निंदिया न आये-जिया घबराए

  देर रात गये सोने की कोशिश मे हूँ. नींद नहीं आती तो ख्याल आते हैं. अकेले में ख्याल डराते है और इंसान अध्यात्म की तरफ भागता है भयवश. यह इन्सानी प्रवृति है, मैं अजूबा नहीं. आधुनिक हूँ तो आधुनिक तरीके अपनाता हूँ अध्यात्म के. बड़े महात्मा जी का
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शब्दचित्र कलाकृति हैं..

कहते हैं शब्दचित्र कलाकृति हैं, हृदय में उठते भावों के रंग से कलम की कूचि से कागज पर चित्रित. कवि, शब्दों को चुनता है, सजाता है, संवारता है और उन्हें एक अनुशासन देता है कि शब्द अपने वही मायने संप्रषित करें जिनकी उनसे अपेक्षा है. हर शब्द नपा तुला, रचना को
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शब्दो के दरमियाँ फासले बहुत थे - A Random Thoughts

शब्दो के दरमियाँ फासले बहुत थे ,पर कुछ बातें तो निकली जुबान से !अनसुनी न थी बातें मेरी ,मगर गुस्ताख़ी का नाम दे गये !यूँ तो फिदरत ही नही समझाने की,कहते कहते बस एक अंजाम दे गए !रचना : सुजीत कुमार लक्की
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सहेजने का महत्व: विल्स कार्ड भाग ९

पहले की तरह ही, पिछले दिनों विल्स कार्ड भाग १ , भाग २ , भाग ३ ,भाग ४ , भाग ५ भाग ६ भाग ७ और भाग ८ को सभी पाठकों का बहुत स्नेह मिला और बहुतों की फरमाईश पर यह श्रृंख्ला आगे बढ़ा रहा हूँ. (जिन्होंने पिछले भाग न पढ़े हों उनके लिए: याद है मुझे सालों पहले, जब
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विकलांगता

  लँगड़ी है दादा जी की छड़ी दीवार का सहारा लिए खड़ी है गूँगा है माँ का सितार तहखाने के कोने में उदास पड़ा है अँधी है बाबू जी की ऐनक धूल खाती पुस्तकों की आलमारी में..   ढो रहा हूँ इनका अस्तित्व मैं एकमात्र जीवित उत्तराधिकारी टूटने को तत्पर अपने
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दूरे हुए मुझसे वो मेरे अपने थे..

कल तक जो मेरे अपने थे, साथ साथ थे, कब किनारा कर बैठे, पता ही नहीं लगा. नये नये साथी जुड़ते गये और भीड़ में खोया मैं उन पुराने साथियों के लिए बस एक भ्रम पाले जीता रहा कि वो अब भी मेरे अपने हैं, मेरे साथ में हैं.. क्यूँ मैं भीड़ में रुक कर नहीं देखता कि जिनके
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सर मेरा झुक ही जाता है...

  अक्सर जब तक कोई विशेष मजबूरी नहीं होती, मैं उस गली से गुजरने से रोकता हूँ खुद को. जानता हूँ, उस गली को छोड़ कर दूसरा रास्ता लेने में मुझे लगभग दोगुनी दूरी तय करनी पड़ती है फिर भी. कुछ विशेष वजह भी नहीं. कुछ सड़क छाप आवारा कुत्ते हैं, वो दिन भर उस गली
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जिन्दगी की बैलेंस शीट पर ’प्रेमी’ से ’समीर’ के बदलते हस्ताक्षर

पिछली पोस्ट में जब मैने ’विल्स कार्ड’ वाली रचनाओं का जिक्र किया, आप सबके स्नेह ने मुझे अभिभूत कर दिया. मजबूर हो गया कि उस ’विल्स कार्ड’ के बंडल में से कुछ और कार्ड खिंचूँ, जो इस बार भारत से ढ़ूँढ़ कर लाया हूँ. अभी पहला ही कार्ड पढ़ रहा था कि लगा: अरे, आ
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स्सा..ले..नमक हराम

दिन बुधवार, रात 10.35...क्रिकेट मैच खत्म हो चुका है...भारत फिर किसी देश को हरा चुका है...टीवी पर फ्लैश – मुंबई पर आतंकवादी हमला... ...लीजिए भारत फिर हार गया...अपने ही लोग हैं...अपनों को ही निशाना बना रहे हैं। एक जगह नहीं...कई – कई जगह गोलियां बरस रही
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What do you want to be?

The constant urge to be a better person is the single most quality that, I feel, separates the individuals into a respectable class and the ordinary ones. Simply because none of us are born great and this urge is the one that makes people to remain
 
Siva
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Goals & Responsibilities

I have heard many 'accomplished' people mentioning proudly about their achievements in life - be it intellectual, social or any other. In general being very happy talking about those accomplishments, these people also do not forget expressing their
 
Siva
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