कड़वी सुपारी है..
कड़वी सुपारी है! आँखों की आरी से,दो-दो दुधारी से,तिल-तिल के,छिल-छिल के, काटी है बारी से...बोलूँ क्या? तोलूँ क्या?ग़म सारे खोलूँ क्या?टुकड़ों की गठरी येपलकों की पटरी पेजब से उतारी है,धरती से, सख्ती सेकिस्मत की तख्ती सेअश्कों की अलबेलीबरसात ज़ारी है..आशिक
Apr 29 2010 04:00 AM



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