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जहाँ हम मिले थे

जहाँ कुछ लम्हें, मेरा हिस्सा बन गए| जहाँ लम्हों में, सदियाँ गुज़ार गई थी| जहाँ तेरी कसक मेरी तलाश थी| जहाँ एक लहर समुन्दर बन गयी थी| जहाँ खुदी सिर्फ एक खिलौना थी| जहाँ वहम का वजूद नहीं था| जहाँ सही गलत के दायरे खोखले थे|
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लंगड़ा वक्त

यादों के बोझ से वक्त लंगड़ा गया है! घड़ी के दो काँटों की बैसाखी लिए.. शाम से रेंग रहा है यहाँ| इसके हर कदम की आहट साफ़ साफ़ सुनाई देती है| यही वक्त था जो हमारे हाथों से यूँ फिसल जाया करता था| कैसे ख़ामोशी से ये अपने तेज कदम रखता था| आकर
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साथ हूँ तुम्हारे

भीड़ में गुम होता एक शख्स… मेरे कुछ रंग अपने चेहरे में लगाये| मुझसा दिखता है| ओझल होता उसका साया घुलता जाता है लोगों में| मुझे अंदर खलिश सताती है| सोचता हूँ भाग के उसे पकड़ लूँ| कुछ उसके रंग अपने चेहरे पे लगा लूँ| रोकता
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वो आवारा

मंज़िलें तडपती रहीं, रास्ते मचलते रहे| वक्त पलट के देखता रहा, उस अवारे को .. उसकी शायद मंजिल ही तलाश थी.. रुसवा कर चुका था वो जज़्बात को… देखता था वो धुंद में तस्वीर कोई… उसकी फितरत ही थी रास्तों को नापने की… ख्यालों की दुनिया उसकी
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क्यों चलता है तू मेरे साथ

क्यों चलता है तू मेरे साथ … खो जा हवाओं में .. बिखर जा फिज़ाओं में .. मैं मौसम हूँ बीत जाऊंगा … अगले बरस मुझे तिनका तिनका जोड़ेगा तू … क्यों चलता है तू मेरे साथ … Filed under: नज़्म, Nazm, Prose Tagged: क्यों चलता है तू मेरे साथ
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कोयले का अंगार

कोयले का अंगार देखा है.. कैसे तिनका तिनका जलके राख होता है| उसकी राख उस से लिपट कर, उसे ही भुझाने लगती है.. उसका अपना ही कुछ, उसकी घुटन बन जाता है.. उसे इंतज़ार है हवा के एक झोंके का.. कोयले का अंगार देखा है.. कभी भडकता, कभी घुटता .. उम्र भर जलकर,
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दरवाज़े सारे बंद हैं

कोई नहीं आएगा यहाँ, इजाज़त नहीं हैं| आज दरवाजे सारे बंद हैं … अंधेरा है ज़हन में, कमरे की रौशनी मद्धम है … आज दरवाजे सारे बंद हैं … मरासिम सारे यहाँ, सर झुका के खड़े हैं| आज इनका सामना मुझसे है| आज ये जवाब देंगे अपने खोखलेपन