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सूर्योदय जीवनोदय

खामोश, रुठे रुठे अंदाज में चलती ज़िन्दगी उदास दिल, जाने किन तूफानों के आने की आशंकाओं से ग्रस्त ऐसे ही चल रहा था ऐसे ही चलता रहता अगर उस सुबह अचानक सूरज की इठलाती किरणों ने एक वृत बनाकर मुझे घेर न लिया होता और छेड़ कर मुस्कुराकर पूछा न होता ” हाल
 
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द्वयक्षर श्लोक : केवल दो अक्षरों से कमाल

द्वयक्षर श्लोक में, जैसा कि इसके नाम से ही स्पष्ट है, केवल दो ही अक्षरों का उपयोग करके श्लोक की रचना की जा सकती है। क्रोरारिकारी कोरेककारक कारिकाकर । कोरकाकारकरक: करीर कर्करोऽकर्रुक ॥ अनुवाद : क्रूर शत्रुओं को नष्ट करने वाला, भूमि का एक कर्ता, दुष्टों को
 
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एकाक्षर श्लोक : अदभुत कल्पनाशक्ति का आग्रह

एक ही व्यंजन का पूर्णरुपेण प्रयोग एकाक्षर श्लोक के निर्माण की अनिवार्यता है। और ऐसा करने का प्रयास करने वाले रचियता के लिये अदभुत कल्पना शक्ति का स्वामी होना जरुरी है। सातवीं सदी में जन्मे महाकवि माघ के “शिशुपाल वध” से एक श्लोक दाददो
 
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महकते रंग गुल में........

महकते रंग गुल में, गुलज़ार होते हैं,मचलते ख़्वाब, स्वप्न के पार होते हैं,ना जाने क्यों, मोहब्बत इम्तहां लेती, जो भी डूबते इसमें, वही कुर्बान होते हैं,बङी खूबी से गिरते हैं, ये पतझङ के जो पत्ते हैं,नाम पत्ता रखा इनका,रंग खो कर भी सवरते हैं,जाम कोई भी हो
 
PREETI BARTHWAL
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प्रेम, अंहकार और टॉनिक

हजारों की भीड़ में भी दूसरे हैं इस कारण अपने होने का अहसास तो रहता है परन्तु तब भी वजूद के होने की बात गहरे में नहीं पनप पाती| यह तो तभी पता चलता है जब हजारों की भीड़ में से कोई एक आकर हाथ थाम लेता है| पहली बार कोई हमारे अपने कारण पास [...]
 
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कटी कटी रे दाढ़ी उसकी

सुनी तो उसने कभी किसी की नहीं न माँ बाप की न अध्यापकों की न बुजुर्गों की न यार दोस्तों की अपनी ही मर्जी का मालिक रहा| लाख दुनिया कहे नहीं बनाई तो नहीं ही बनाई दाढ़ी शादी भी उसकी मनमौजी हरकतों पर रोक न लगा पायी अपनी मर्जी से बना ली तो बना ली [...]
 
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क्यों…?

खाली रह जाता हूँ मैं, बार-बार । जितना भी तुम भरती हो, मैं खाली होता जाता हूँ । तरल होता जाता हूँ, पल-पल, हमेशा, मैं ठोस होने की कोशिश में ।
 
चंदन कुमार झा
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प्रकृति के रंग में भंग डालता आत्महंता मनुष्य

सब नाटकों से बड़ा बहुत बड़ा एक नाटक जीवन में रचा जाता रहता है हर पल जहाँ कुछ तो जाना पहचाना होता रहता है और कुछ एकदम अनज़ाना घटता रहता है इस नाटक का निर्देशन प्रकृति करती है प्रकृति के इस नाटक के पात्र हमेशा बदलाव की तलाश में लगे रहते हैं आकाश के असीमित
 
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हबीब तनवीर : हीरे की अँगूठी

24 अक्टुबर 1995 को आये पूर्ण सूर्यग्रहण ने प्रख्यात रंगकर्मी हबीब तनवीर साब का कविरुप जाग्रत कर दिया था और इन्होने इस अवसर पर निम्नांकित कविता को रचा था। आज हबीब साब को गुजरे हुये एक साल हो गया है। हबीब साब को श्रद्धांजलि उन्ही की कविता दे सकती है। हीरे
 
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रंगमंच और जीवन

रंगमंच की दुनिया भी कैसी होती है? वहाँ लोग उसका अभिनय करते हैं जो वे वास्तविक जीवन में नहीं होते| उनका अभिनय यह बताता है कि एक मनुष्य कितने ही रूप धारण कर सकता है या कि एक मनुष्य में कितनी संभावनाएँ हो सकती हैं| नाटक एक कला है जो अन्य कलाओं कि
 
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अभिनय

हे अभिनेता! तुम अभिनय को अपने द्वारा निभाए गये पात्र को वास्तविक न मानने लगना| तब अभिनय भी एक ऐसा नशा हो जाएगा जो जीवन के वास्तविक स्वरूप को हटाकर कहीं और व्यस्त कर देता है दिमाग को और कुछ समय के लिए व्यक्ति जो वह नहीं है वही होने का भ्रम पाल लेता
 
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खबरदार श्रीमान नेता जी

सुनो नेता जी तुम क्यों एक नंगे बच्चे जैसा व्यवहार करते हो जो अपनी आँखें बंद कर लेता है और सोचता है कि अब उसे कोई नहीं देख रहा। तुमने कछुआ तो देखा ही होगा जो अपने खोल के अंदर घुस कर छिप जाता है और सोचता है कि खतरे से बच गया है। तुम [...]
 
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अटल बिहारी वाजपेयी : कवि की उलझन

राह कौन सी जाऊँ मैं? चौराहे पर लुटता चीर चलूँ आखिरी चाल कि बाजी छोड़ विरक्ति सजाऊँ? सपना जन्मा और मर गया मधु ऋतु में ही बाग झर गया तिनके टूटे हुये बटोरुं या नवसृष्टि सजाऊँ मैं? राह कौन सी जाऊँ मैं? दो दिन मिले उधार में घाटों के व्यापार में कौड़ी कौड़ी का
 
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अटल बिहारी वाजपेयी : कवि की व्यथा

सूर्य गिर गया अन्धकार में ठोकर खाकर भीख माँगता है कुबेर झोली फैलाकर कण कण को मोहताज कर्ण का देश हो गया माँ का अँचल द्रुपद सुता का केश हो गया
 
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हफीज मेरठी : शायर के खून और पसीने से टपके सात सुर

शानो शौकत के लिये तू परेशान है और मेरी य’ तमन्ना कि तेरा किरदार बने यह बाँकपन है हमारा कि जुल्म पर हमने बजाय माला ओ फरियाद के शाइरी की है पैगाम ये मिला है जनाबे हफीज को अंजाम पहले सोच लें तब शाइरी करे पैरहन की मैने जब तारीफ की कहने लगे हम तुम्हे [...]
 
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उदघोषणा !

माहौल को और ज्यादा सड़ते हुये नहीं देख सके वे लोग और खड़े होकर उन्होने हुंकार भर ही दी सच के तेज से भरे, कई चेहरे एक साथ चमक उठे जोश से भरी आवाजों ने एक साथ कर दी उदघोषणा। अब धर्म के नाम पर भी हमारे रक्त में उबाल नहीं आता हमारे सम्प्रदाय के [...]
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हफीज मेरठी : तीन मोती शायर की विरासत से

कुछ लोग शायद परिचित न हों उर्दू के शायर मरहूम हफीज मेरठी और उनकी शायरी से। मेरठ के रहने वाले हफीज साब ने जिन्दगी से जुड़ी हुयी शायरी की। उनकी शायरी को केवल समय बिताने का ख्याल लिये हुये नहीं पढ़ा जा सकता क्योंकि उनके शब्द पढ़ने वाले को अन्दर तक झकझोरते हैं।
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गज़ल क्या है

सुबह के इन घंटों को गुरुदेव चौपाल काल कहा करते हैं। इन्ही घंटों में उनके तमाम शिष्य गण उनके दर्शन कर अपनी जो भी शंकाऐं होते हैं उनके सामने रखते हैं और गुरुदेव अपनी सामर्थ्य भर उनका निवारण करने की कोशिश करते हैं। आज भी रोजाना उनके दरबार में हाजिरी लगाने
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पुनर्मिलन

दूर कहीं एक तारा टूटा पास यहीं एक कोयल कूकी पास यहीं किसी ने यादें उगायीं दूर कहीं किसी ने हिचकी ली दूर कहीं किसी के नयनों में अश्रु छलके पास यहीं किसी ने आँखे पोंछी पास यहीं किसी ने ऊपर उड़ता जहाज देखा दूर कहीं किसी ने चाँद को आँखों से पिया दूर कहीं [...]
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कौन तो लिखता है, कौन तो रचता है

प्रतीत तो ऐसा ही होता है कि यह लिखा मेरे द्वारा ही जा रहा है पर क्या लिखने वाला वास्तव में “मैं” ही हूँ ? मेरे देखे मेरे समझे तो, कभी एक तीन से तेरह साल का बाल मन, कभी चौदह से उन्नीस साल का किशोर मन, कभी बीस से पचास साल का युवा मन, [...]
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मन के भय

समय कभी ऐसे भी रंग दिखाता है कि खुशियों से भरे क्षण भी पूरा सुकून नहीं ला पाते| मन अन्दर ही अन्दर चौंकता रहता है, एक भय सा बैठ जाता है मन में ऐसा लगने लगता है जाने कब ठंडी बयार के झौंके बहने बंद हो जायेंगे और निराशाएं, कुंठाएं हमेशा की सिर उठा सामने
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स्वयं की बुराइयों का भय

मन डरता है गुलाब के उस फूल की भाँति जिसे भय हो कि जब उसे चाहने वाला उसे छूने लगेगा तो उसके हाथों में कहीं काँटे न चुभ जायें
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मन के फरेब

सच कुछ भी हो पर मन माने तब ना। वह तो विचार ढूँढे रखता है अपने आप को बहला कर रखने के लिये। अपने मुताबिक शब्दों की खुराक से मन का पेट तो भर जाता है पर वक़्त की कसौटी पर ऐसे बहलाव ऐसे छलावे खतरनाक ही साबित होते हैं। पर मन की [...]
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मातृत्व की विरासत

माँ, क्या कभी भी बड़ी हो पाती है अपने बच्चों की बढ़ती उम्र के साथ? क्यों उसके अन्दर आधुनिक जमाने की समझदारी नहीं आती? बड़े होकर बच्चे अपनी अपनी राह पकड़ कर चल देते हैं वे आगे चले जाते हैं अपनी जिन्दगी जीने माँ को पीछे छोड़कर। माँ जानती है इस बात को शुरु से
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“मैं” है तो प्रेम कहाँ

अपने मैं को खोकर जिसे पाते वह सौगात प्रेम की !
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प्रेम का फूलना

कली से फूल प्रेम से और प्रेम खुद से आते !
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निर्माण कृति का

क्यों निर्माण करना चाहता हूँ उस कृति का जो मुस्कुराये खिलखिलाये प्रकृति के साथ हर कदम हो पूर्ण यौवन का कदम चले तो द्वार खुलें प्रगति के रुकना भी हो एक विशेष अनुभूति से परिपूर्ण मैं जानता हूँ मजबूर कर दिया जाऊँगा इन्ही कुंठाओं में जीने के लिये जो मैने खुद
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पूर्ण समर्पण

जो हुआ ठीक हुआ बीत गया सो बात गयी सुबह नयी है फिर से आया है सूरज आकाश में हवा भी तो इठलाती बल खाती चलती है साथ में अपने हाथ फैला कर रख लो होने वाली है सपनो की बरसात पास में कदमों को यूँ उठा कर चलो दिशाएं नृत्य करने लगें साथ [...]
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प्रेम और समय

जाने कैसे ऐसा होता है जाने क्यों ऐसे होता है बीते हुए की स्मृर्तियों के साथ साथ आकर जाने कब तुम खिलवाड़ करने लगते हो मेरे फुरसत के लम्हों से| जाने कैसे हज़ारों मीलों लंबी दूरियाँ यूँ पल भर में तय हो जाती हैं और फिर समय बीतता तो है पर इसका एहसास होने
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प्रेम और अंहकार

समय रहते एक बार तो जवाब दे दो मेरी पुकार का| बाद में ऐसा ना हो समय उलझा ले अपनी व्यस्तता के जाल में मुझे| और विवश मै चाहकर भी तुम्हारी आवाज ही न सुन पाँऊ |
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मुकम्मिल इनसानियत की धार थी

 यादें हैनसन टी के स्मृतियों  का कोठार है मेरा हृदयमैंने कुछ वैसे ही सहेज रखी हैप्रियजनों  की यादेंजैसे कोई अमीर व्यापारी  तिजोरी मेंबंद किये रखता है सोना-चांदीपसलियों के पिंजरे में कैद मेरी
 
ajay prakash
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मुकम्मिल इनसानियत की धार थी

 यादें हैनसन टी के स्मृतियों  का कोठार है मेरा हृदयमैंने कुछ वैसे ही सहेज रखी हैप्रियजनों  की यादेंजैसे कोई अमीर लाला तिजोरी मेंबंद किये रखता है सोना-चांदीपसलियों के पिंजरे में कैद मेरी प्रिय यादों को न तेज हवाएं
 
ajay prakash
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शर्म और प्रेम

साँस उखड़ती जाती है पलकें झुकती जाती हैं गाल सुर्ख़ हुए जाते हैं ऊँगलियाँ खेलती जाती हैं बालों की घुंघराली लटों से पैर क़ुरेदते जाते हैं ज़मीन को पर लबों की हिमाकत तो देखिए कहे चले जाते हैं अभी भी हमें उनकी परवाह नहीं!
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नेह भरा काजल

बचपन, कभी लगता है कि बस अभी ही तो बीता था, और आज भी इतना पास है कि हाथ बढ़ाया और छू लिया, और कभी लगता है कि किसी और ही जन्म में बचपन भी जीवन में आया था। पर जब जब बचपन इसी जन्म की बात लगता है, तब यह आकर बिल्कुल पास में [...]
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पास दूर

दूर होने की कसक पुल बन जाती है अक्सर दिलों को क़रीब लाने को पर अति निकटता के अहसासों की आँच जाने क्यों कभी कभी विलग कर देती है दिलों को मानो संबंधों की ऊष्मा से घबरा जाते हों मन
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कुत्ता / आदमी

ज़ुबाँ क्या पा ली आदमी नेखुद कोबावज़ूद अपनी तमाम खामियों के इंसान का दर्ज़ादे डाला.बे-ज़ुबाँ कुत्ता बेचारा विरोध अपना दर्ज़ न करा पायाऔ'बावज़ूद अपनी तमाम अच्छाइयों के रह गया एक अपशब्द-मात्र बनकर.
 
Abhishek Neel
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आज का सच

इच्छाओं में वृद्धि, आमंत्रण है तनावों को, क्योंकि चाही गयी हर इच्छा पूर्ण नहीं होती, पर अगर यूँ कामनाओं, आकांक्षाओं को न बढाएं, तो लगता है कि वक्त से कहीं पीछे चल रहे हैं! कहीं औरों से पिछड़ न जाएँ, का डर संतुष्ट नहीं रहने देता ! ऑंखें बंद कर झांक कर
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महासंग्राम

बार बार की खिटपिट से अच्छा होता है एक बार का महासंग्राम युद्ध के बाद का इतिहास ही बताता है कौरवों और पाण्डवों का पक्ष वरना ज्यादातर तो बलरामों की भीड़ ही हुआ करती है!
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अंतरचेतना

तुम नहीं जानतीं, इन मूल्यों की कोई कीमत नहीं है आज, नैतिकता के सवाल बेमानी हैं अब| ये जो तुम्हारी प्रेरणा है ना, अच्छा बनने की, सच्चा बनने की, ये सब तो अयोग्यताएं है आज के दौर में| तुम मुझे भोंदू बनाना चाहती हो? यदि मैं तुम्हारे द्वारा बताये सब
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Show me my path, O Swami.

At a time when there is no sun,And life seems to be all rain;I pray to you, O Swami,Come -Show me the right path once again.Life has been confusingFor eight long years now;I hope sincerely -You will come;And with your blessingsMe bestow.Sometimes I feel
 
Abhishek Neel
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