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'भगवान' -यादवचंद्र के प्रबंध काव्य "परंपरा और विद्रोह" का अष्टम सर्ग

'भगवान' -यादवचंद्र के प्रबंध काव्य "परंपरा और विद्रोह" का अष्टम सर्ग #fullpost{display:none;} अनवरत के पिछले अंकों में आप यादवचंद्र जी के प्रबंध काव्य "परंपरा और विद्रोह" के आठ सर्ग पढ़ चुके हैं। अब तक प्रकाशित सब कड़ियों को यहाँ क्लिक कर के पढ़ा जा सकता
 
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"पौरुष और कला" - यादवचंद्र

जनपक्ष के पिछले अंकों में आप यादवचंद्र जी के प्रबंध काव्य "परंपरा और विद्रोह" के दो सर्ग पढ़ चुके हैं। इस काव्य का प्रत्येक सर्ग एक पृथक युग का प्रतिनिधित्व करता है। युग बदलने के साथ ही यादवचंद्र जी काव्य-रूप भी बदल देते हैं। यह इस के हर नए सर्ग को पढ़ते
 
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'वीर भोग्या वसुन्धरा' -यादवचंद्र के प्रबंध काव्य "परंपरा और विद्रोह" का अष्टम सर्ग

अनवरत के पिछले अंकों में आप यादवचंद्र जी के प्रबंध काव्य "परंपरा और विद्रोह" के सात सर्ग पढ़ चुके हैं। अब तक प्रकाशित सब कड़ियों को यहाँ क्लिक कर के पढ़ा जा सकता है। इस काव्य का प्रत्येक सर्ग एक पृथक युग का प्रतिनिधित्व करता है। युग परिवर्तन के साथ ही
 
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'गुलाम तब जागे' -यादवचंद्र के प्रबंध काव्य "परंपरा और विद्रोह" का सप्तम सर्ग

अनवरत के पिछले अंकों में आप यादवचंद्र जी के प्रबंध काव्य "परंपरा और विद्रोह" के छह सर्ग पढ़ चुके हैं। अब तक प्रकाशित सब कड़ियों को यहाँ क्लिक कर के पढ़ा जा सकता है। इस काव्य का प्रत्येक सर्ग एक पृथक युग का प्रतिनिधित्व करता है। युग परिवर्तन के साथ ही
 
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'पितृभाग' -यादवचंद्र के प्रबंध काव्य "परंपरा और विद्रोह" का षष्टम सर्ग

अनवरत के पिछले अंकों में आप यादवचंद्र जी के प्रबंध काव्य "परंपरा और विद्रोह" के चार सर्ग पढ़ चुके हैं। अब तक प्रकाशित सब कड़ियों को यहाँ क्लिक कर के पढ़ा जा सकता है। इस काव्य का प्रत्येक सर्ग एक पृथक युग का प्रतिनिधित्व करता है। युग परिवर्तन के साथ ही
 
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'पार्वती' -यादवचंद्र के प्रबंध काव्य "परंपरा और विद्रोह" का पंचम सर्ग

#fullpost{display:none;} अनवरत के पिछले अंकों में आप यादवचंद्र जी के प्रबंध काव्य "परंपरा और विद्रोह" के चार सर्ग पढ़ चुके हैं। अब तक प्रकाशित सब कड़ियों को यहाँ क्लिक कर के पढ़ा जा सकता है। इस काव्य का प्रत्येक सर्ग एक पृथक युग का प्रतिनिधित्व करता है।
 
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"मनुष्य का विकास" - यादवचंद्र के प्रबंध काव्य "परंपरा और विद्रोह" का द्वितीय सर्ग

प्रथम सर्ग  ; धऱती माता' (पूर्वार्ध) प्रथम सर्ग "धऱती माता" (उत्तरार्ध)अनवरत के पिछले अंकों में आप यादवचंद्र जी के प्रबंध काव्य "परंपरा और विद्रोह" के प्रथम सर्ग धरती माता का पूर्वार्ध और उत्तरार्ध पढ़ चुके हैं। इन दोनों कड़ियों को ऊपर दिए गए लिंक
 
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"धरती माता" यादवचंद्र के प्रबंध काव्य "परंपरा और विद्रोह" का प्रथम सर्ग

#fullpost{display:none;} यादवचंद्र जी से शायद आप परिचित न हों, उन के परिचय के लिए उन की एक रचना  से साक्षात्कार ही पर्याप्त है। अनवरत पर उन की कुछ रचनाएँ मैं ने प्रस्तुत की थीं। वे केवल समर्थ क्रांतिकारी कवि ही नहीं थे अपितु उन के व्यक्तित्व के बहुत
 
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"धऱती माता" (उत्तरार्ध) : परंपरा और विद्रोह-2 * यादवचंद्र *

परंपरा और विद्रोह  प्रथम सर्ग  धऱती माता (पूर्वार्ध) यादवचंद्र जी के प्रबंध काव्य "परंपरा और विद्रोह" के प्रथम सर्ग "धऱती माता" का पूर्वार्ध पिछले अंक में प्रस्तुत किया गया था, जिस में "विश्व के उद्भव से पृथ्वी के जन्म" तक का वर्णन था। इस
 
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परंपरा और विद्रोह ... स्व. यादव चंद्र का एक प्रबंध काव्य

यादवचंद्र जी से शायद आप परिचित न हों, लेकिन उन के परिचय के लिए उन की एक रचना ही पर्याप्त है। अनवरत पर उन की कुछ रचनाएँ मैं ने प्रस्तुत की थीं। वे केवल समर्थ कवि ही नहीं थे अपितु उन के व्यक्तित्व के बहुत विस्तृत आयाम थे। वे ओजस्वी वक्ता, क्रांतिकारी कवि,
 
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अलमस्त शायर फ़िराक़ गोरखपुरी

आज यानी 3 मार्च को अपने ही ढंग के अलमस्त शायर फिराक़ गोरखपुरी की पुण्यतिथि है। फिराक़ साहब को याद करते ही मैं लौट जाती हूँ अपने बचपन के दिनों में।चूँकि मेरे पिताजी फिराक़ साहब के स्टूडेंट रहे है तो वे काफी करीबी से उनसे वाकिफ़ रहे है। फिराक़ की शायरी का
 
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दिमाग में शिवजी की जटा से भी ज्यादा उलझाव है

ओम जी को भूल गये? आपने उन्हें याद ही कब किया कि भूलेंगे. क्या पता आप उन्हें जानते ही न हो. दिल्ली में रहने वाले कई मिले जिन्होने लाल किला ही नहीं देखा जब कि उनकी उम्र भी लाल किला से कम न होगी. अब आप ये न कहाना कि मेरा इतिहास कमजोर से भी ज्यादा कमजोर
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न हँसे कोई, न मुस्कुराए, बस ठहाका लगाया जाय

ज सुबह सुबह् एक मेल मिला प्रिय बसंत जी, किसी ने ख़ब ही कहा है- हँसना रवि की प्रथम किरण सा, कानन मेंनवजात शिशु सा . हमारा वर्तमान इतना विचित्र है,की अपनी इस सहज ,सुलभ विशिष्टताको हमने ओढ लियाहै, हर आदमी इतना उदास है,की उसे हँसने के लिए लाखों जतन करनेप
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सूरज-चन्दा जैसे रौशन

सूरज-चन्दा जैसे रौशन हो जाएँ दिल सब के रौशन आप जो मेरे साथ चलेंगे हो जाएँगे रस्ते रौशन दिल को रौशन करने वाले मेरा घर भी कर दे रौशन खिड़की से कुछ जुगनू आकर कर जाते हैं कमरे रौशन इक दीपक के जल जाने से दीवारो-दर सारे रौशन चाँद सा चेहरा कब आएगा मेरे घर क
 
जतिन्दर परवाज़
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बारिशों में नहाना भूल गए

बारिशों में नहाना भूल गएतुम भी क्या वो ज़माना भूल गएकम्प्यूटर किताबें याद रहींतितलियों का ठिकाना भूल गएफल तो आते नहीं थे पेड़ों परअब तो पंछी भी आना भूल गएयूँ उसे याद कर के रोते हैंजेसे कोई ख़ज़ाना भूल गएमैं तो बचपन से ही हूँ संजीदातुम भी अब मुस्कुराना भूल गए
 
JATINDER PARWAAZ
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वो नज़रों से मेरी नज़र काटता है

वो नज़रों से मेरी नज़र काटता हैमुहब्बत का पहला असर काटता हैमुझे घर मैं भी चैन पड़ता नही थासफ़र में हूँ अब तो सफ़र काटता हैये माँ की दुआएं हिफाज़त करेंगीये ताबीज़ सब की नज़र काटता हैये फिरका-परसती ये नफ़रत की आंधीपड़ोसी, पड़ोसी का सर काटता हैतुम्हारी जफा पे
 
JATINDER PARWAAZ
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रचना श्रीवास्तव

प्रकाशित कविताएँ जशन उस शहर में कोई कैसे मनाये बेच न पाया ईमान (पुरस्कृत कविता) बाणों से बिंधा देश है क्षणिकाएँ (पुरस्कृत कविता) क्षणिकाएँ (यूनिकविता) जब मैंने लिखी एक कविता (यूनिकविता) अन्तर्मन (यूनिकविता) शादी- चार समीकरण (यूनिकविता) हमको माफ़ करो
 
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