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प्रकृति के रंग में भंग डालता आत्महंता मनुष्य

सब नाटकों से बड़ा बहुत बड़ा एक नाटक जीवन में रचा जाता रहता है हर पल जहाँ कुछ तो जाना पहचाना होता रहता है और कुछ एकदम अनज़ाना घटता रहता है इस नाटक का निर्देशन प्रकृति करती है प्रकृति के इस नाटक के पात्र हमेशा बदलाव की तलाश में लगे रहते हैं आकाश के असीमित
 
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रंगमंच और जीवन

रंगमंच की दुनिया भी कैसी होती है? वहाँ लोग उसका अभिनय करते हैं जो वे वास्तविक जीवन में नहीं होते| उनका अभिनय यह बताता है कि एक मनुष्य कितने ही रूप धारण कर सकता है या कि एक मनुष्य में कितनी संभावनाएँ हो सकती हैं| नाटक एक कला है जो अन्य कलाओं कि
 
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अभिनय

हे अभिनेता! तुम अभिनय को अपने द्वारा निभाए गये पात्र को वास्तविक न मानने लगना| तब अभिनय भी एक ऐसा नशा हो जाएगा जो जीवन के वास्तविक स्वरूप को हटाकर कहीं और व्यस्त कर देता है दिमाग को और कुछ समय के लिए व्यक्ति जो वह नहीं है वही होने का भ्रम पाल लेता
 
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