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अफ़ज़ल से हम हिसाब करें

यह मीनारों मेहनत से उठती अज़ानेंमशीनों में ढलते यह ग़म के तरानेनए साल की खै़रियत चाहते हैंइबादत में डूबे यह कल कारख़ानेयह माटी की महिमा है, माथे से लगा लोयह पत्थर की मूरत है, सर को झुका लोयह लाशें तरसती रही hain कफ़न कोनए साल में पहले इसको संभालोबहुत पहले
 
शहरोज़
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