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मणियाँ

फूलों की बगिया ज्यों किश्तों में खिलती है इंसां की किस्मत भी किश्तों में जगती है भला छाते ही बादल कहीं बरखा भी होती है अरे होने-बरसने में इक उम्र गुज़रती है मिलना-बिछड़ना, व हँसना व रोना इन के ही मिश्रण से शख़्सियत निखरती है जब आता है संकट, हम खुद को पर
 
Rahul Upadhyaya
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मनमोहक दृश्य

बहारें रंग भरती हैं कोहरा रंग चुराता है भरने-लुटने के संवाद में पत्तियों का रूप मनोरम हो जाता है बावला बाबुल वात्सल्य का अंधा समझ नहीं कुछ पाता है शाख बढ़ा कर हाथ हिला कर शू-शू करता जाता है नटखट कोहरा बाज न आए इत-उत मंडराता है कभी इधर से कभी उधर से पत
 
Rahul Upadhyaya
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जो गुज़र गया वो गुज़श्ता है

जो गुज़र गया वो गुज़श्ता है जो हाथ में है वो गुलदस्ता है जिसे कहता साक़ी ज़माना था उसे हम कहते आज बरिस्ता है जो प्यार करे और घाव न दे वो आदमी नहीं फ़रिश्ता है रिश्तों से बड़ा कोई नासूर नहीं नासूर तो केवल रिसता है देख चाँद समंदर कुछ यूँ बौराया कि आज भी रेत
 
Rahul Upadhyaya
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न वोटर हूँ, न लीडर हूँ

न वोटर हूँ, न लीडर हूँ उछालता सब पर कीचड़ हूँ निंदा करने की 'बग' है मुझमें कहता इसको 'फ़ीचर' हूँ देश की जनता को कहता हूँ पागल ख़ुद को बताता मैं हटकर हूँ इसको नहीं, तुम मत उसको देना ई-मेल से देता नसीहत हूँ समस्याओं से लड़ने का उपदेश हूँ देता और स्वयं भटकत
 
Rahul Upadhyaya
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