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"माँ बूढ़ी है"

"माँ बूढ़ी है" माँ बूढी़ है  - कविता वाचक्नवीझुककरअपनी ही छाया केपाँव खोजतीमाँ केचरणों मेंनतशिर होने कादिन आने से पहले-पहले ;कमरे से आँगन तक आकरबूढ़ी कायाकितना ताक-ताक सोई थी,सूने रस्तेबाट जोहतीधुँधली आँख,  इकहरी कायाकितना
 
कविता वाचक्नवी Kavita Vachaknavee
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प्रीत के वट-वृक्ष!

प्रीत के वट-वृक्ष! - कविता वाचक्नवी फूल बरसे थे नहीं औ’ भीड़ ने मंगल न गाए ढोलकों की थाप मेहंदी या महावर हार, गजरे, चूड़ियाँ सिंदूर, कुमकुम था कहीं कुछ भी नहीं, कुछ छूटने का भय नहीं। गगन ने मोती दिए थे लहलहाती ओढ़नी दी थी धरा ने और माटी ने महावर पाँव
 
कविता वाचक्नवी Kavita Vachaknavee
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