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ऐ जिन्दगी ! मैं संवारूं भी तुझे तो क्या सोचकर !

जख्म जो दिए, वो रखे है मैंने ज़िंदा खरोंचकर !ऐ जिन्दगी ! मैं संवारूं भी तुझे तो क्या सोचकर !! मुरादें बही सब धार में, फंसा ही रहा मझधार में,अब लाभ है क्या, सैलाब के अवशेषों को पोंछकर !ऐ जिन्दगी ! मैं संवारूं भी तुझे तो क्या सोचकर !!मन में बसा इक घाव है,
 
पी.सी.गोदियाल
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कशमकश !

कशमकश बढ़ जाती है खुद-व-खुद,जब कभी उनका हाल नहीं मिलता,अश्क बहाने को जी करता है किन्तु,पोंछ्न्रे को स्वच्छ रूमाल नहीं मिलता !ये जिसने भी कहा, सच ही कहा है किऐनवक्त पर साला कुछ भी काम नहीं आता,थक चुका हूँ सुबह से ट्राई कर-करके,मगर कमबख्त उनका कॉल नहीं
 
पी.सी.गोदियाल
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टन्न और चियर्स !

एक साथ ऊपर उठकरहवा में छलकते पैमाने,मदयम 'टन्न' की स्वर लहरी,चेहरे पे मंद-मंद बिखरतीसारे दुःख-दर्द , ग़मों पर मानोकोई विजयी मुस्कराहट ,और मटकती आँखों कावो नशीला अंदाज !मुद्दत से, सोचता हूँपता नहींक्या खता हुई किकानो ने नहीं सूनी"चियर्स" की आवाज !!नोट : कल
 
पी.सी.गोदियाल
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कभी सोचा !

आने वाले दौर के लोग पूछेंगे,कि आज के दौर में ये मंज़र आये क्यों थे !सब कुछ अगर ठीक-ठाक था,तो हर तरफ शरीफों ने खंजर उठाये क्यों थे !तब तुम सफाई दोगेकि गलती सरकार की थी,तो वो तुम पर हँसेंगे और कहेंगे, बेशर्मो ,तुमने ताजो-तख़्त पे कंजर बिठाए क्यों थे !!
 
पी.सी.गोदियाल
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विरह गीत !

छवि गूगल से साभारमीत तुम कब आओगे,कब तक यूं तडपाओगे,जान बाकी है,अरमान बाकी है,पास कब बुलाओगे,मीत तुम कब आओगे !झुठलाओ न मुझे,झूठे वादों की तरह,ये नयन झरते हैसावन-भादों की तरह,कब तक यूं सताओगे,मीत तुम कब आओगे !!दिल में आस है,मन मेरा उदास है,क्या तुम्हे भीयह
 
पी.सी.गोदियाल
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समीप तेरे मकाँ खोल दी मैंने !

समीप तेरे मकाँ खोल दी मैंने.इक अपनी दुकाँ खोल दी मैंने,चाहे तो जी भर खरीददारी करन चाहे तो फुकां खोल दी मैंने !हुश्न पे जिया जो , हुश्न पे मरेंगा ,वादाखिलाफी न हरगिज करेंगा ,उम्मीदी की जुबाँ खोल दी मैंने,इक अपनी दुकाँ खोल दी मैंने!किसने कहा, कोई ना जानता
 
पी.सी.गोदियाल
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दर्द की इक दुकाँ खोल ली मैंने !

झंझटों की पोटली मोल ली मैंने,ब्लोगिंग जीवन में घोल ली मैंने,गम खरीदता हूँ, खुशियाँ बेचता हूँ,दर्द की इक दुकाँ खोल ली मैंने !सुबह-शाम कंप्यूटर पर जमे रहकर,वक्त कट जाता है,खुद में रमे रहकर,फुर्सत के हिस्से का परिश्रम बेचकर,यह चीज बड़ी ही अनमोल ली मैंने!दिल
 
पी.सी.गोदियाल
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वह रीत नहीं दोहरानी है !

जीवन नदिया की धार है, ख्वाइशे बहता पानी है,बयाँ लफ्जों में करूँ कैसे, दो दिलों की कहानी है!पानी में उठ रहे है जो बुलबुले बारिश की बूंदों से,मौसम के कुछ पल और, न खुलने की निशानी है!रुकावटें बहुत सी आयेंगी हमारे सफ़र के दरमियाँ,तू अपने हुश्न को संभाले रख,
 
पी.सी.गोदियाल
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हौंसला !

इसलिए प्यार है मुझे,इसलिए मिस करता हूँ उन्हें,उन ख़ूबसूरत ऊँचे पहाडो को,जिनके, कहीं चिकने, कहीं खुरदुरे सीनों पर,मरहम की तरह लिपटी,नरम-मुलायम बर्फ जब पिघलकर, बूँद-बूँद आंसुओ की तरह बहकर कहीं ओझल होती है तब भी,अपने ह्रदय को पिघलता छोड़ जग दिखावे को वह दृडता
 
पी.सी.गोदियाल
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सोचो-सोचो !!

सिर्फ मुद्दा उठाने व चिंता व्यक्त कर देने भर से,क्या सोचते हो देश-तंत्र सुधर जाएगा ?जाने-अनजाने ये विनाश का बीज जो बो रहे है,क्या पौधा बनके हमारे ही समक्ष आयेगा?सोचो-सोचो !लिख देने या फिर किसी एक के कहने भर से,क्या यह देश कभी सुधरने वाला है ?देश सुधारने
 
पी.सी.गोदियाल
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छिटपुट शेर !

सीने में संजोई तेरी याद, कैसे मैं भुला लूंगा,तुम जितने मर्जी गम दो, मैं मुस्कुरा लूंगा,गुजारिश बस इतनी है, तेरे चेहरे की रौनक न बुझे,अपने हिस्से के आंसू मुझे दे देना, मैं बहा लूंगा !!~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~खुशी सदा तेरे दर पे ठहर जाए, ये दुआ मांगता
 
पी.सी.गोदियाल
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सोसिअल स्वैप !

पश्चिम से इम्पोर्ट किया हुआआइडिया है यह अपने देश में,और दिनोदिन लोकप्रिय भी हो रहा है,सोसिअल स्वैप यानिवस्तु विनिमय केंद्र,जहां आप घर की फालतू वस्तुवेआसानी से डंप कर सकते है !सुनने में आया है किबंगलौर में ऐसे ही एकवोमन सोसिअल स्वैप में,बहुत सी महिलाएअपने
 
पी.सी.गोदियाल
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जमाना !

क्या ज़माना आ गया कि आईने में उभरतेअपने ही अक्श का संज्ञान नंगे नहीं लेते,सरे राह किसी को एक रूपये का सिक्काभीख में देना चाहो,तो भिखमंगे नहीं लेते !गली से गुजरती इक मस्त-बयार कह रही थीकि ये दुनिया सचमुच में बहुत खराब हो गई,इसीलिये हम आजकल किसी से पंगे
 
पी.सी.गोदियाल
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मैं चिंतित हूँ !

वो अमृत तलाशा जा रहा हैजिससे कि इंसान, यानिभ्रष्ट, कातिल, दुराचारी,व्यभिचारीऔर इन सबका बाप राजनेता, मरेगा नहीं, चिरजीवी हो जाएगा !गर शरीर का कोई अंगनिष्क्रिय हो जाए कभी,तो नया अंग उग आयेगा ,अपने ही जैसा एक औरभ्रष्ट, निकृष्ट व कमीना चाहिए तोक्लोनिंग की
 
पी.सी.गोदियाल
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दो जून की रोटी !

सुबह जागा तो अचानक याद आया,वो पहली मुलाकात, दो जून याद आया,जब तुम आई थी, मेरी कुटी पे,चंचल, झील से दो नयना,चेहरे पे वो कातिलाना मुस्कराहट लिए,मैंने भी संकुचाते हुए पूछा था जब तुम्हारा नाम ,कुछ बलखाते , कुछ शर्माते हुए तुमनेअपना नाम बता भी दिया था !सुनकर,
 
पी.सी.गोदियाल
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सबके सब बिन पैंदे के लोटे हो गए है !

बापू, अब तेरे देश में, अच्छे लोगो के टोटे हो गए है ,जिधर देखो, सब के सब बिन पैंदे के लोटे हो गए है !कोई लल्लू बन के लुडक रहा, कोई चिकना मुलायम,खुद को अमर बताने वाले, खा-खा के मोटे हो गए है !!तेरे इस देश के गरीब की तो माया भी निराली हो गई,धन चिंता में दिल
 
पी.सी.गोदियाल
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विकसित होता भारत देखो !

अटल, सोनिया, एपीजे, मनमोहन और प्रतिभा-रत देखो,लालू, मुलायम, ममता , येचुरी, प्रकाश-वृंदा कारत देखो !संतरी देखो, मंत्री देखो, अफसर, प्रशासक सेवारत देखो,आओ दिखाएँ तुमको अपना,विकसित होता भारत देखो !! शहर,सड़क व गलियों की 'प्रगति-ज्वर' से हया मर
 
पी.सी.गोदियाल
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यूं भी वफ़ा होते है लोग !

निसार राहे वफ़ा करके जाना कि राहे जफा होते है लोग,सच में, हमें मालूम न था कि यूं भी खफा होते है लोग !हम सोचते थे कि ये जज्बा नेमत है खुदा की, किसे पता,वफ़ा की कस्मे खाने वाले, इस कदर बेवफा होते है लोग !आग लगा जाते है घरों में, दनल से नफरत करने वालों
 
पी.सी.गोदियाल
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कल रात को मैं कुछ लिख न पाया !

मुझको मेरी रहमदिली ने सताया,कल रात को मैं कुछ लिख न पाया !धीमी- आहिस्ता शाम ढल रही थी,मेरे सामने इक शमा जल रही थी !तभी फिर वहाँ एक परवाना आया,कल रात को मैं कुछ लिख न पाया !पतंगा कोई एक गीत गा रहा था,शम्मा के इर्द-गिर्द मंडरा रहा था !प्यार के जुनून में था
 
पी.सी.गोदियाल
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स्पष्ठीकरण !

इर्द-गिर्द सदा ही घूम पाता, मैंने तोतुमसे वो धूरी माँगी थी, दूरी नहीं,दिल की बात हम हक़ से कह जाते,वो सहभागिता माँगी थी, मजबूरी नहीं !मेरे दिल में रखने की आदत बुरी है,हर ख्वाब दिल के कोने में सजाता हूँ,इजहार-ए-इश्क मेरी पलकें कर लेती है ,हर बात लबों पे
 
पी.सी.गोदियाल
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पहाडी सड़क !

आड़ी-तिरछी ,टेडी-मेडी,कहीं चिकनी,कहीं कड़क,सुनशानपहाडी सड़क,यों समेटे है खूबसूरतीवह भी शुद्ध सब,दीखने में मगरएकदम खूसट सीगंवार, बेअदब,रास्तों का मंजर औरखुशनुमा पलों का प्राकृतिक सौन्दर्य ,पथिक को भाता है,मगरकोप- इजहार सभी को डराता है!पथिक का मन रखने को,झूठ
 
पी.सी.गोदियाल
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अदभुत !

दर्द इस दिल को जमीं दे रही है,संताप सारा आसमान दे रहा है!पलकों में सुलगते नफरतों के शोलेयादों में तपता जहान दे रहा है !!वो चले गए हमसे दामन छुड़ाकर,हमारे दिल के फेल होने के डर से !इक सब्र है जो हमसफ़र बनकरसंग हरइक घड़ी इम्तहान दे रहा है !!जो सच था वही तो
 
पी.सी.गोदियाल
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ब्लॉगरों ने तो लगता है पी ली भांग है !

ब्लॉगरों ने तो लगता है पी ली भांग है ,कुछ ठीक नहीं चल रहा सब उटपटांग है!निकले तो हिंदी की दुर्दशा सुधारने को थे,और खीच रहे बस एक-दूजे की टांग है!!लिखने का मकसद क्या सिर्फ वोट है?लगता है कि हिंदी में ही कुछ खोट है!वरना क्यों हर एक साहित्यिक पुंजयहाँ लग
 
पी.सी.गोदियाल
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अभी तुम्हे तो बहुत दूर तक चलना है !

आज उदित सूरज है हर हाल में तुम्हे जलना है !कल सांझ चौखट पे दस्तक देगी, तुम्हे ढलना है !!ये सच है कि पहाड़ सी जिन्दगी जीना आसां नहीं !फिर भी पहाड़ बनके क्षण-क्षण हिम सा गलना है !!वातावरण से छीन के कोई ले गया है खुसबूओ को !तुम्हे चट्टान बनके उन हवाओं का रुख
 
पी.सी.गोदियाल
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इस बार मेरी माँ ने ख़त नहीं भेजा गाँव से !

कल मदर्स डे के सुअवसर पर मैंने उस बाबत कुछ नहीं लिखा, क्योंकि मुझे अपनी माँ से एक शिकायत है कि उसने मुझे घडियाली आंसू बहाना नहीं सिखाया ! पता नहीं क्यों ? एक दूसरी वजह भी थी , जिसे यहाँ बयाँकर रहा हूँ इन चंद पंक्तियों में ;इस बार इस दिन सैर सपाटे पर नहीं
 
पी.सी.गोदियाल
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निरुपमा के बहाने एक गजल !

मित्रो, व्यस्तता की वजह से आज ब्लोग-जगत पर मेरी उपस्थिति कम ही रही, मगर मैं समझता हू कि अभी भी यहां इस ब्लोग जगत पर पत्रकार निरुपमा की असामयिक और दर्दनाक मौत से समबन्धित चर्चाओं का बाजार काफ़ी गरम है। जैसा कि मैने कुछ ब्लोग मित्रों के ब्लोगो पर कुछ
 
पी.सी.गोदियाल
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कोई तो बताये मिलती कहाँ होगी ?

कुछ शर्म खरीदनी है,अपने लिए भी औरअपने देशवासियों के लिए भी !मुझे लगता है कि शरीर मेंविटामिन की तरह इसकी भीनित कमी होती जा रही,लाख जुतियाने पे भीये कम्वख्त शर्म नहीं आ रही !हर शख्स काभ्रष्टाचार के दलदल में खिला चेहरायहाँ कमल जलज लगता है ,और हवाओं का रुख
 
पी.सी.गोदियाल
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वो शख्स !

वो शख्स !जो जिन्दगी से हुआ 'बोर' है,और पैदाइशी कामचोर है,मेहनत करना नहीं चाहता,भूखों मरना नहीं चाहता,जुए-उठाईगिरी में भाग्य आजमाया,मगर कहीं भी शकून न पाया,अभी कल ही सड़क पर जातीबग्गियों से गन्ना लूछ रहा रहा था,मुझे देखा तो मुझसे से पूछ रहा था,भाई साहब, आप
 
पी.सी.गोदियाल
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तू सच क्यों बोलता है ?

एक पुरानी कविता बस यूँ ही याद आ गई , अगर आपने पहले न पढी हो थोड़ा सा लुफ्त आप भी उठाइये ;छल-कपट है जिस जग मेंअंहकार भरा हर रग-रग में !उस जगत की सब चीजों को तूएक ही तराजू से क्यों तोलता है ?झूठ-फरेब भरी दुनिया में,गोदियाल,तू सच क्यों बोलता है ?जहां
 
पी.सी.गोदियाल
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पहला पैग !

जीना है तो आश जगा, दिल में इक अहसास जगा,हर दरिया को तर सकता है, मन में यह विश्वाश जगा!हलक उतरता जाम न हो, साकी फिर बदनाम न हो,तृप्ति का कोई छोर नहीं है, पीना है तो प्यास जगा!बेदर्दी दिल तोड़ गया जो, बीच राह अकेला छोड़ गया जो,आयेगा फिर हमराही बनकर,
 
पी.सी.गोदियाल
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मिश्रित दूध !

बहुत बोलते सुना हैतुमको कि तुम,ये कर दोगे, वो कर दोगे !चलते हुए के कानों में भी,मिश्री कि तरह जहर भर दोगे !अपनी माँ का दूध पिया है तोहमारे भी कान भर के दिखाओ !ज़रा दूध का दूध औरपानी का पानी कर के दिखाओ !ये होता कैसे हैमुझे भी सीखना है,क्योंकि मुझे ये
 
पी.सी.गोदियाल
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मजदूर दिवस पर- क्या नहीं था अपने, इस हरे-भरे चमन में!

एक ख़ूबसूरत सी लम्बी-चौड़ी जमीं थी,दूर क्षितिज तक पसरा खुला आसमा था,रेत-टापू, जंगल-हरियाली,खेत-खलिहान,हिम-सागर, खनिज-संपदा, पहाड़-मैदान,ढेरों कलकल करती नदियों का समा था !सुख-श्याम धरा में ,सौम्य नील गगन में,क्या नहीं था अपने, इस हरे-भरे चमन
 
पी.सी.गोदियाल
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खामियाजा !

दो ही रोज तो गुजरे जुम्मे-जुम्मेमगर अब शायद ही याद हो तुम्हे,किसी बेतुकी सी बात पर भड़ककरउतर आये थे तुम दल-बल सडक पर,तुमने अपनी नाखुशी जताने कोराह चलते राहगीर को सताने को ,लिए हाथों में ईंट, पत्थर तुम्हारा जन-जनकर डाला मिलकर वो क्रूर भौंडा सा प्रदर्शन
 
पी.सी.गोदियाल
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महंगाई का ग्राफ भी अब नीचे आ गया !

महलों में झूठ के वर्क से कुछ और सजावट आ गई ,लवों पर कुछ और कुटिल शब्दों की बनावट आ गई !सरकार की महंगाई का ग्राफ भी अब नीचे आ गया,क्योंकि मानवीय मूल्यों में कुछ और गिरावट आ गई !!बच्चो ने भूख से समझौता कर बिलखना छोड़ दिया,मजबूरी और हालात के टूटे तटबंधों में
 
पी.सी.गोदियाल
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तेरे इस देश में इतने ..... !

यहाँ लुच्चे-लफंगों की भरमार क्यों है,तेरे इस देश में इतने गद्दार क्यों है !जहां हर कोई ढूढता है मर्ज की दवा,ये न पूछे कोई इतने बीमार क्यों है !पृथ्वीराज आते मितव्ययता बरतकर,मगर ये जैचंद आते हर बार क्यों है !मगरमच्छ तो हाथी का मल खा गए,परिंदे की बीट पर
 
पी.सी.गोदियाल
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ये दिल्ली वाले कम लेते है !

तू मेरी ऐ गल सुन कुडिये,ये इश्क के बदले गम देते है,ओये तू अब बस कर मुंडिये ,ये दिल्ली वाले कम लेते है !आँखों में दौलत का नशा है,दिलों में इनकी जलन होती है,बात करेंगे दुष्ट-दमन कीकरनी आत्म-दलन होती है !कदम डगमगाते घर से बाहर,घर के अन्दर थम लेते है,ओये तू
 
पी.सी.गोदियाल
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ऐ वक्त ! तू इतना कमवख्त क्यों है !

मन-पांखी हो रहा इस कदर बेचैन और अशक्त क्यों है,मुझको बता दे ऐ वक्त ! तू इतना कमवख्त क्यों है !खुद ही कहता है कि हरपल- हर कदम मेरे साथ चल,मंजिलों की डगर में फिर सफ़र करता विभक्त क्यों है !डगमगाने लगी दिलों की मझधार में कश्तियाँ सभी,लहरों का साहिल पे मगर
 
पी.सी.गोदियाल
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एक नालायक पुत्र की पिता को सलाह !

अपनों में ढूंढो,बेगानों में ढूंढो,चमन में ढूंढो,वीरानो में ढूंढो,पहाड़ों में ढूंढो,मैदानों में ढूढो,फ्लैटों में ढूंढो,मकानों में ढूंढो,शमाओ में ढूंढो,परवानो में ढूंढो,आशिकों में ढूंढो,दीवानों में ढूंढो,इस दौर में ढूंढो,जमानों में ढूंढो,मगर मेरे बाप !इस
 
पी.सी.गोदियाल
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निट्ठले व खडूस सारे कामकाजी बन गए है !

सुना है कि बेनमाजी अब नमाजी बन गए है ।निट्ठले व खडूस सारे कामकाजी बन गए है।।अपना असली मनहूस चेहरा छुपाने को,दाड़ी रखकर मिंयाँ घोटा हाजी बन गए है ।अदाई की रस्म खुद तो निभानी आती नहीं,और जनाव इस शहर के काजी बन गए है।।यों तो लोगो को सिखाते फिर रहे हैं
 
पी.सी.गोदियाल
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हमें ऐसा न कोई तट मिला

आशिकी जिस दर से की थी, वहाँ बेनामियों का जमघट मिला,दोस्ती इक समंदर से की थी,मगर सूनामियों का झंझट मिला !अपने नाम के खातिर तो उम्रभर, हम हरगिज नहीं भागे कहीं,पर इक नाम जब ओंठो ने पुकारा, बदनामियों का पनघट मिला !पाने को हम भटकते रह गए, इक झलक उनके हुश्न के
 
पी.सी.गोदियाल
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