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मुरली तेरा मुरलीधर 46

सहनशील रजकण प्रशान्त बन प्रभुपथ में बिछ जा मधुकरकिसी भाँति उसके पदतल मे ललक लिपट लटपट निर्झरप्राणकुंज के सुमन में सुन उसकी मनहर बोलीटेर रहा अर्पणानुभावा मुरली तेरा मुरलीधर ॥२४६॥हो न रही मारुत सिहरन की क्या अनुभूति तुम्हें मधुकरक्या न सुन रहे दूर तरंगित
 
हिमांशु । Himanshu
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मुरली तेरा मुरलीधर 45

निज प्रियतम के विशद विश्व में और न कुछ करना मधुकरनिरुद्देश्य उसके गीतों को झंकृत कर देना निर्झरपंकिल भर देना निज कोना बहा गीतधारा प्रभुमयटेर रहा अर्चनोद्वेलिता मुरली तेरा मुरलीधर।२४१।जग उत्सव मे प्राणनाथ का मिला निमन्त्रण है मधुकरआशीर्वादित हुये प्राण
 
हिमांशु । Himanshu
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मुरली तेरा मुरलीधर 44

गाने आया जो अनगाया गीत अभी तक वह मधुकरवीण खोलते कसते ही सब बासर बीत गये निर्झरसही समय आया न सज सके उचित शब्दसंभार कभीटेर रहा समयानुकूलिनी मुरली तेरा मुरलीधर।२३६।मारुत रोता रहा खिले पर गहगह फूल नहीं मधुकरइच्छाओं की पीडा का ही था उरभार गहन निर्झरगृह
 
हिमांशु । Himanshu
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मुरली तेरा मुरलीधर - 42

वह इच्छुक है सुनने को तेरे गीतों का स्वर मधुकरआ आ मुख निहार जाता है नीर नयन में भर निर्झरसरस तरंगित उर कर अपना बाँट रहा आनन्द विभवटेर रहा सुख गीत गुंजिता मुरली तेरा मुरलीधर ॥२२६॥सुन वह कैसे गाता तूँ विस्मय विमुग्ध सुन-सुन मधुकरइस नभ से उस नभ तक करता
 
हिमांशु । Himanshu
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मुरली तेरा मुरलीधर 20

इन्द्रिय घट में भक्ति रसायन भर भर चखता रह मधुकर तन्मय चिन्तन सच्चा रस में देता तुम्हें बोर निर्झर कर त्रिकाल उस महाकाल के चरणामृत का आस्वादन टेर रहा नैवेद्यतुलसिका मुरली   तेरा    मुरलीधर।।111।। मन तो नित गिरता रहता है सलिल सदृश
 
हिमांशु । Himanshu
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मुरली तेरा मुरलीधर 19

अहं रहित मह मह महकेंगे तेरे प्राण सुमन मधुकर स्निग्ध चाँदनी नहला देगी चूमेगा मारुत निर्झर तुम्हें अंक में ले हृदयेश्वर हलरायेगा मधुर मधुर टेर रहा है मूलाधारा  मुरली   तेरा    मुरलीधर।।106।। उर वल्लभ के पद शतदल में मरना मिट
 
हिमांशु । Himanshu
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मुरली तेरा मुरलीधर 18

अपनी ही विरचित कारा में बंधा तड़पता तू मधुकर अपनी ही वासना लहर से पंकिल किया प्राण निर्झर उस प्रिय की कर पीड़ा हरणी चरण कमल की सुखद शरण टेर रहा है प्रीतिपंकिला  मुरली   तेरा    मुरलीधर।।101।।गीत वही तेरे अधरों पर स्वर उसका ही
 
हिमांशु । Himanshu