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मुक्तिका: .....डरे रहे. --संजीव 'सलिल'

मुक्तिका.....डरे रहे.संजीव 'सलिल'**हम डरे-डरे रहे.तुम डरे-डरे रहे.दूरियों को दूर कर निडर हुए, खरे रहे.हौसलों के वृक्ष पालगन-जल हरे रहे.रिक्त हुए जोड़कर बाँटकर भरे रहे.नष्ट हुए व्यर्थ वे जो महज धरे रहे.निज हितों में लीन जो समझिये मरे रहे.सार्थक हैं वे
 
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
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तेवरी : हुए प्यास से सब बेहाल ----'सलिल'.

तेवरी  : हुए प्यास से सब बेहाल ----'सलिल'. हुए प्यास से सब बेहाल.सूखे कुएँ नदी सर ताल..गौ माता को दिया निकाल.श्वान रहे गोदी में पाल..चमक-दमक ही हुई वरेण्य.त्याज्य सादगी की है चाल..शंकाएँ लीलें विश्वास.नचा रहे नातों के व्याल..कमियाँ दूर करेगा कौन?बने
 
दिव्य नर्मदा divya narmada
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गीतिका: कद छोटा परछाईं बड़ी है... ---आचार्य संजीव 'सलिल'

गीतिकासंजीव 'सलिल'कद छोटा परछाईं बड़ी है.कैसी मुश्किल आई घड़ी है.चोर कर रहे पहरेदारीसच में सच रुसवाई बड़ी है..बीवी बैठी कोष सम्हालेखाली हाथों माई खड़ी है..खुद पर खर्च रहे हैं लाखोंभिक्षुक हेतु न पाई पडी है..'सलिल' सांस-सरहद पर चुप्पीमौत शीश पर आई-अड़ी
 
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
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ग़ज़ल --बहुत हैं मन में लेकिन --संजीव 'सलिल'

ग़ज़लसंजीव 'सलिल' बहुत हैं मन में लेकिन फिर भी कम अरमान हैं प्यारे. पुरोहित हौसले हैं मंजिलें जजमान हैं प्यारे..लिये हम आरसी को आरसी में आरसी देखें. हमें यह लग रहा है खुद से ही अनजान हैं प्यारे..तुम्हारे नेह के नाते न कोई तोड़ पायेगा. दिले-नादां को लगते
 
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
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मुक्तिका: खुशबू -संजीव 'सलिल'

मुक्तिकाखुशबूसंजीव 'सलिल' कहीं है प्यार की खुशबू, कहीं तकरार की खुशबू..कभी इंकार की खुशबू, कभी इकरार की खुशबू.. सभी खुशबू के दीवाने हुए, पीछे रहूँ क्यों मैं?मुझे तो भा रही है यार के दीदार की खुशबू..सभी कहते न लेकिन चाहता मैं ठीक हो जाऊँ.उन्हें अच्छी लगे
 
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
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तेवरी; पाखंडी झंडे लिये --संजीव 'सलिल'

तेवरी संजीव 'सलिल' पाखंडी झंडे लिये, रहे देश को लूट. आड़ एकता की लिये, डाल रहे हैं फूट.. सज्जन पर पाबंदियाँ, लुच्चों को है छूट. तुलसी बाहर फेंक दी, घर में रक्षित बूट.. चमचम-जगमग कलश तो, बिखरे पल में टूट. नींव नहीं मजबूत यदि, भरी न जी भर कूट.. गुनी अल्प,
 
दिव्य नर्मदा divya narmada
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तेवरी: मार हथौडा, तोड़ो मूरत. संजीव 'सलिल'

तेवरी संजीव 'सलिल' मार हथौडा, तोड़ो मूरत.बदलेगी तब ही यह सूरत.. जिसे रहनुमा माना हमनेकरी देश की उसने दुर्गत..आरक्षित हैं कौए-बगुलेकोयल-राजहंस हैं रुखसत..तिया सती पर हम रसिया हों.मन पाले क्यों कुत्सित चाहत?.खो शहरों की चकाचौंध में किया गाँव का बेड़ा
 
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
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तेवरी: हुए प्यास से सब बेहाल. -संजीव 'सलिल'

तेवरी: संजीव 'सलिल' हुए प्यास से सब बेहाल. सूखे कुएँ नदी सर ताल.. गौ माता को दिया निकाल. श्वान रहे गोदी में पाल.. चमक-दमक ही हुई वरेण्य. त्याज्य सादगी की है चाल.. शंकाएँ लीलें विश्वास. नचा रहे नातों के व्याल.. कमियाँ दूर करेगा कौन? बने बहाने हैं जब ढाल..
 
दिव्य नर्मदा
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तेवरी: हुए प्यास से सब बेहाल. -संजीव 'सलिल'

तेवरी: संजीव 'सलिल' हुए प्यास से सब बेहाल. सूखे कुएँ नदी सर ताल.. गौ माता को दिया निकाल. श्वान रहे गोदी में पाल.. चमक-दमक ही हुई वरेण्य. त्याज्य सादगी की है चाल.. शंकाएँ लीलें विश्वास. नचा रहे नातों के व्याल.. कमियाँ दूर करेगा कौन? बने बहाने हैं जब ढाल..
 
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तेवरी: सागर ऊँचा-पर्वत गहरा संजीव 'सलिल'

तेवरी:सागर ऊँचा-पर्वत गहरासंजीव 'सलिल' सागर ऊँचा-पर्वत गहरा.अंधा न्याय, प्रशासन बहरा..खुली छूट आतंकवाद को.संत आश्रमों पर है पहरा..पौरुष निस्संतान मर रहा.वंश बढाता रक्षित मेहरा..भ्रष्ट सियासत देश बेचतीदेश-प्रेम का झंडा लहरा..शक्ति पूजते जला शक्ति को.सूखी
 
दिव्य नर्मदा
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तेवरी : खर्चे अधिक आय है कम. --संजीव 'सलिल'

तेवरी संजीव 'सलिल' खर्चे अधिक आय है कम.दिल रोता आँखें हैं नम..पाला शौक तमाखू का.बना मौत का फंदा यम्..जो करता जग उजियारा उस दीपक के नीचे तम..सीमाओं की फ़िक्र नहीं.ठोंक रहे संसद में ख़म..जब पाया तो खुश न हुए.खोया तो करते क्यों गम?टन-टन रुचे न मन्दिर
 
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गीतिका: तितलियाँ --संजीव 'सलिल'

गीतिका तितलियाँ संजीव 'सलिल' *यादों की बारात तितलियाँ.कुदरत की सौगात तितलियाँ..बिरले जिनके कद्रदान हैं.दर्द भरे नग्मात तितलियाँ..नाच रहीं हैं ये बिटियों सीशोख-जवां ज़ज्बात तितलियाँ..बद से बदतर होते जाते.जो, हैं वे हालात तितलियाँ..कली-कली का रस लेती
 
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
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गीतिका: तुमने कब चाहा दिल दरके? --संजीव वर्मा 'सलिल'

गीतिका संजीव वर्मा 'सलिल' * तुमने कब चाहा दिल दरके? हुए दिवाने जब दिल-दर के। जिन पर हमने किया भरोसा वे निकले सौदाई जर के.. राज अक्ल का नहीं यहाँ पर ताज हुए हैं आशिक सर के। नाम न चाहें काम करें चुप वे ही जिंदा रहते मर के। परवाजों को कौन नापता? मुन्सिफ हैं
 
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गीतिका: तुमने कब चाहा दिल दरके? --संजीव वर्मा 'सलिल'

गीतिका संजीव वर्मा 'सलिल'*तुमने कब चाहा दिल दरके?हुए दिवाने जब दिल-दर के। जिन पर हमने किया भरोसावे निकले सौदाई जर के..राज अक्ल का नहीं यहाँ परताज हुए हैं आशिक सर के।नाम न चाहें काम करें चुपवे ही जिंदा रहते मर के। परवाजों को कौन नापता?मुन्सिफ हैं सौदाई पर
 
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गीतिका: तुमने कब चाहा दिल दरके? --संजीव वर्मा 'सलिल'

गीतिका संजीव वर्मा 'सलिल' * तुमने कब चाहा दिल दरके? हुए दिवाने जब दिल-दर के। जिन पर हमने किया भरोसा वे निकले सौदाई जर के.. राज अक्ल का नहीं यहाँ पर ताज हुए हैं आशिक सर के। नाम न चाहें काम करें चुप वे ही जिंदा रहते मर के। परवाजों को कौन नापता? मुन्सिफ हैं
 
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गीतिका: वक्त और हालात की बातें --संजीव 'सलिल'

गीतिका संजीव 'सलिल' वक्त और हालात की बातें खालिस शह औ' मात की बातें.. दिलवर सुन ले दिल कहता है . अनकहनी ज़ज्बात की बातें .. मिलीं भरोसे को बदले में, महज दगा-छल-घात की बातें.. दिन वह सुनने से भी डरता होती हैं जो रात की बातें .. क़द से बहार जब भी निकलो मत
 
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गीतिका: वक्त और हालात की बातें --संजीव 'सलिल'

गीतिका संजीव 'सलिल' वक्त और हालात की बातें खालिस शह औ' मात की बातें.. दिलवर सुन ले दिल कहता है . अनकहनी ज़ज्बात की बातें .. मिलीं भरोसे को बदले में, महज दगा-छल-घात की बातें.. दिन वह सुनने से भी डरता होती हैं जो रात की बातें .. क़द से बहार जब भी निकलो मत
 
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