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मुक्तिका: .....डरे रहे. --संजीव 'सलिल'
मुक्तिका.....डरे रहे.संजीव 'सलिल'**हम डरे-डरे रहे.तुम डरे-डरे रहे.दूरियों को दूर कर निडर हुए, खरे रहे.हौसलों के वृक्ष पालगन-जल हरे रहे.रिक्त हुए जोड़कर बाँटकर भरे रहे.नष्ट हुए व्यर्थ वे जो महज धरे रहे.निज हितों में लीन जो समझिये मरे रहे.सार्थक हैं वे
May 30 2010 01:38 PM



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