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क्यों इतना बदल गई हैं आज की माँयें. . . . . . कहीं ख्वामखाह ही तो नॉस्टेल्जिक नहीं हो रहा मैं।

...मेरे नॉस्टेल्जिक मित्रों,बहुत तेज गर्मी थी कल तक...शरीर, मन और आत्मा सब को मानो सुखा सा डाला था इस दहकती गर्मी ने...इतने में देखता क्या हूँ कि भरी दोपहर में न जाने कहाँ से अचानक अवतरित हुऐ काले-घने बादल... तकरीबन आधे घंटे तक चली बहुत तेज आँधी और
 
प्रवीण शाह
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