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बरसाती ख़याल कुछ यू भी

मेघा आज फिर टुटके बरसे तुम मीत से माटी से ‘महक’ ऊठी , इश्क में सराबोर निकली | ================================ ये क्या हुआ ‘महक’, दीवानगी की सारी हदे पार कर ली सावन में बरसी हर बूँद तुने,अपने अंजुरी में भर ली | =================
 
mehhekk
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बाबुल

आज पितः दिवस पर कहने और लिखने के लिए बहुत कुछ सोचा ,मगर बस स्नेह के अलावा और कुछ समझ न आया ,बहुत पहले लिखे कुछ ख्याल है नयनो की जलधारा को, बह जाने दो सब कहतेपर तुम इस गंगा जमुना को मेरे बाबुल कैसे सहतेइसलिए छूपा रही हूँ दिल के एक कोने मेंजहाँ तेरे सं
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