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शायद इसलिए है सारे मौन...(कविता),

पहले तो मौन और फिर  पण्डित जी     को पढ़ा तो मन जो विचार उठे वो ही आज आपके समक्ष है.....सब खुद से ही बोल रहे है,अपमे मन को टटोल रहे है.....अन्दर ही अन्दर खुद को तोल रहे है,लगा अपनी आत्मा का मोल रहे है,ऐसे में भला
 
kunwarji's
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