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कौन खोंट लेता है मन पर उगी हरी दूब (मनोज झा की 4 कविताएँ)

मनोज कुमार झा एक बेहद अलग वाक्य-विन्यास की कविताएँ लिखते हैं। इनकी कुछ कविताओं से हमने आपके पिछले सप्ताह परिचय करवाया था। आज हम इनकी कुछ और कविताओं को प्रकाशित कर रहे हैं-इस तरफ से जीनायहाँ तो मात्र प्‍यास-प्‍यास पानी, भूख-भूख अन्‍नऔर साँस-साँस भविष्‍यवह
 
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इधर की कथा में मृत्‍यु कभी भी आ सकती है

इन दिनों जी गईं और महसूस की गईं कविताओं से हम सम्पादकों का बहुत कम ही वास्ता पड़ता है। लेकिन मनोज कुमार झा की कविताओं में उनके आस-पास का सच उसी विद्रूपता के साथ दिखाई पड़ता है, जैसा वो होता है। अपनी ख़ास शैली में अपनी बात कहने वाले मनोज खाँटी देशज़
 
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