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''हिन्द स्वराज'' के बहाने इस नए बनते समाज पर चर्चा

कुंवारियों के माँ बनने की रफ्तार बढ़ी है, अगर यही नयी सभ्यता है तो मुझे कुछ भी नहीं कहना''हिन्द स्वराज'' का हर पाठ हमें नित नए अर्थ-लोक तक ले जाता है। ''हिंद स्वराज'' की शताब्दी केवल एक पुस्तक की शताब्दी (२००९) ख़त्म होने के बाद भी उस पर चर्चा होती
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भालू भाग रहा था, उसके पीछे मैं

चलिए आज आप सबको एक घटना के बारे में बताता हूँ । ये घटना तब घटी जब मैं अपने काम के सिलसिले में मध्य प्रदेश के सीधी जिले के एक गाँव में कुछ महीनों के लिए ठहरा हुआ था ।  एक भू-वैज्ञानिक होने के नाते मध्य भारत के कई स्थानों में रहना भी हुआ और काम
 
Indranil Bhattacharjee ........."सैल"
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जाती प्रथा

यह कुतर्क हमेशा दिया जाता है कि जातिप्रथा की शुरुआत इसलिए की गयी थी कि हमारा समाज कर्म के अनुसार सुव्यवस्थित हो सके । इन जातिप्रथा के समर्थकों से ये पूछिए कि दुनिया के दुसरे देशों में यह व्यवस्था नहीं है तो क्या वहां का समाज व्यवस्थित नहीं है? बल्कि
 
Indranil Bhattacharjee ........."सैल"
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जब्बार ढाकवाला को याद करते हुए...

मौत ने हमसे एक सार्थक लेखक छीन लिया...नहीं...नहीं....यह खबर सच न हो....लेकिन खबर सच है. दुखी का देने वाली है. व्यंग्यकार और कवि जब्बार ढाकवाला नहीं रहे. सात मई को ऋषिकेश के पास सड़क हादसे में उनका निधन हो गया. उनके साथ उनकी धर्मपत्नी तरन्नुम भी चल
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अब शांति की बात खबर नहीं बनती,...खबर बनती है अशांति. हिंसा, तोड़फोड़..

आज रायपुर के टाउन हाल में देश के विभिन्न हिस्सों से आये बुद्धिजीवियों की एक सभा हुई. प्रख्यात वैज्ञानिक प्रो. यशपाल, बुजुर्ग गांधीवादी नारायणभाई देसाई, सर्वोदयी अमरनाथजी, गाँधी शांति प्रतिष्ठान की राधा बहन, पूर्व सांसद-चिन्तक रामजी सिंह और छत्तीसगढ़ में
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वनवासियों का दर्द

23 अप्रेल 2010 को लोकसभा में आदिवासी विकास के बजट पर बहस में झारखंड के पूर्व मुख्य मंत्री अर्जुन मुंडे को सुन रहा था। अर्जुन मुंडे बी जे पी से संसद सदस्य हैं। बी जे पी से हों या कांग्रेस या किसी साम्यवादी पार्टीँ से अगर बात दिल की गहराई से आती है तो असर
 
गिरिराज किशोर
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अपने वतन में सब कुछ है...

मुझे नहीं, हम सभी को पता है कि अपने वतन में सब कुछ है. लेकिन सब कुछ उपलब्ध कराने का ज़िम्मा जिन लोगों को सौंपा गया है, उनकी नीयत, उनकी बरकत के क्या कहने! ताज़ा वाकया ऐसा है जिसे सुन कर आप का सर शर्म से झुक जाएगा, शर्त है कि आप में सम्वेदना
 
सर्वत एम०
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छत्तीसगढ़ के मीडिया का स्याह चेहरा....:

छत्तीसगढ़ में मीडिया का जो चेहरा बनाता जा रहा है, उसे देख कर रोना आता है.अब सच को सच लिखना ही कठिन है, बाकी आप कंडोम के विज्ञापन छापे, लिंगवर्धक यंत्र के विज्ञापन भी छाप सकते है, अंधविश्वास फैलने वाली खबरे, हो या फ़िल्मी दुनिया कि नंगी सब चलेगा, लेकिन
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छत्तीसगढ़ की डायरी-3

छत्तीसगढ़ के घाट पर, भई अफसरन की भीररोज़ यहाँ रूपया घिसैं,घर सब खाए खीर..अभी पिछले दिनों रायपुर में एक आईएएस बाबूलाल अग्रवाल के यहाँ छापा मारा गया तो अरबों की संपत्ति का पता चला। इससे पता चलता है, कि हमारे अफसर कितने समृद्ध हैं। देश में एक अच्छा संदेश
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छत्तीसगढ़ की डायरी

सच्चा पंचायती राज कब आएगा..?छत्तीसगढ़ में पंचायत के चुनाव भी हो गए। अब जनता के लोग गाँव-गाँव में नए भारत के निर्माण के लिए अपना योगदान करेंगे। गाँधीजी यही चाहते थे। लेकिन पंचायती राज की जो असलियत है, वह किसी से छिपी नहीं है। राजधानी में पिछले दिनों कुछ
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श्लीलता और अश्लीलता

श्लीलता और अश्लीलता पर समाज में सदियों से बहसें चलती रही है, उस वक़्त भी जब किसी महिला की नग्न मूर्ती बनाई गयी और उसे कला का नाम दिया गया था. मतलब यह कि हर काल में दो धराये बहती रहती है. आज भी यही हो रहा है. हम प्रगतिशीलता की, खुलेपन की बाते करते है, और
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छत्तीसगढ़ की डायरी-1

नक्सलियों से निपटने सेना की जरूरत नहींबस्तर में नक्सलियों से निपटने के लिए सेना की जरूरत नहीं है। यह बात एक बार फिर सामने आई है। और बात कही है केंद्रीय गृह मंत्री ने। पिछले दिनों वे राजधानी में थे। एक बैठक में उन्होंने कहा कि हमारी पुलिस और अर्धसैनिक बल
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साहित्य अकादमी की स्वायत्तता?

देश हो या संस्था उसकी स्वायत्तता को खतरा अंदर के लोगों से होता है। या कहिए उन हां-बरदार मित्रों से होता है जो संस्था-हित से अधिक अपने स्वार्थों को ‘चिड़िया की आंख’ की तरह ताकते रहने की कुव्वत पैदा कर लेते हैं। मित्र मैं इसलिए कह रहा हूं क्योंकि संस्था का
 
गिरिराज किशोर
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मातृत्व की महिमा से छल

एटा जेल में हिरासत में रह रहे अपने पुत्र वरूण गाँधी से मिलने के लिए पहुँची मेनका गाँधी को जेल प्रशासन ने नियमो का हवाला देते हुए मिलने नहीं दिया। राजनैतिक कारणो के चलते मायावती सरकार ने जिस तरह वरूण गाँधी पर रासुका लगाया है, उसे लेकर व्यथित और नाराज़
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कहां है संविधान और कहां है जनतंत्र?

मैं संविधान और जनतंत्र की बात क्यों कर रहा हूं? फिर सोचता हूं सब ही कर रहे हैं तो मैं भी कर रहा हूं तो क्या गुनाह कर रहा हूं? जब संज्ञाएं और शब्द अर्थ खो देते हैं तो उनका कोई महत्त्व नहीं रहता। ऐसे में अर्थहीन शब्द बोलना गुनाह नहीं रहता। जब किसी भाषा
 
गिरिराज किशोर
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अपणी ढोणी

राजस्थानी के लिए तो समझना कठिन नहीं है कि अपणी ढोणी क्या है। लेकिन बिना देखे और जाने किसी दूसरे प्रदेश वासी के लिए शायद आसान न हो। किसी भी प्रदेश के रहने वाले क्यों न हों, हम लोग अपनी ग्रामीण संस्कृति की न शब्दावली से रले मिले रहे और न जीवन से। बस सु
 
गिरिराज किशोर
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हिंदी राजभाषा होने का अर्थ

मैं यह कह सकता हूं और कहना भी चाहता हूं कि हिंदी का राजभाषा होना हमारे लिए सम्मान की बात है पर चाह कर भी कह नहीं पाता। ‘राजभाषा’ नेहरू सरकार द्वारा हिंदी के धंधेबाज़ों को दिया गया स्वर्ण खिलौना है। हिंदी के लिए राजभाषा नाम उस वक्त निर्मित यानी कॉयन किया
 
गिरिराज किशोर
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आखिर कब तक टालेंगे पुलिस सुधार ?

आखिर कब तक टालेंगे पुलिस सुधार ?जम्मू कश्मीर के शापियाँ बलात्कार और हत्या मामले चीख-चीख कर कह रहे हैं कि जिस विभाग पर जनता की सुरक्षा की जिम्मेदारी है, वही अगर उसके अधिकारों का भक्षक बन जाए तो उनके विरुद्ध जाँच की कोई निष्पक्ष संस्था नहीं है.उसी पुलिस के
 
विनय ओझा 'स्नेहिल'
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हमें नहीं चाहिए सम्मान, क्या कल्लोगे?

हाँ सुना था हमने भी. चिल्ला रहे थे मीडिया वाले - “सुनो सुनो सुनो! दो सिंह को सरकारी तमगे के लिए बुलाया गया”. किसी ने हमारे मन की बात सुनी? आपकी मर्जी हुई और आप हमारे पैसे कमाने वाले रोजी रोटी पर फ़िदा हो गए. कर दिया घोषणा कि “भई आओ ए
 
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आपको आपकी रचना कैसी लगी?

हम अक्सर जब भी कुछ लिख कर उठते हैं तो सोचते हैं कि आज हमने बहुत ही धाँसू रचना की है. क्या कहें इतना बड़ा तीर मारा है कि आज तो साहित्य के स्तम्भ उखड़े ही उखड़े. लोग तो बस, क्या कहने हैं. पढ़ते ही झूम उठेंगे. सामने होता तो कहीं हाथ ही न [...]
 
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हम वोट क्यों दें?

एक बार नजर दौड़ाईए देश के उन व्यक्तियों पर जो संभावित रूप से प्रधानमंत्री बन सकते हैं और फिर बताईये कि आपको यह नहीं लगता कि आप से कहा जा रहा है कि “इन बेशर्मों और बेगैरतों में से एक को अपना प्रधानमंत्री चुन लो”. आप कहेंगे कि इन पार्टियों क
 
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Randy Pausch: Childhood Dreams Lecture

Randy Pausch was a Professor of Computer Science, Human-Computer Interaction, and Design at Carnegie Mellon University (CMU) in Pittsburgh, Pennsylvania. In September 2006, Pausch was diagnosed with metastatic pancreatic cancer. Pausch delivered his
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आजचा धडा :

आजच्‍या घडिला आपलं मत प्रामाणिकपणे एखाद्‍याला सांगणं जुनाट समजलं जायला लागलंय !!!कोणतेसे सर बर्नार्ड शाँ बरोबर म्‍हणून गेलेत, "when people ask for opinions, all they want is praise."better you be updated on the same, or else be ready to face the
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गुलाल आणि होळी

मी काही नियमितपणे सिनेमांची परिक्षणं लिहित नाही. पण काही सिनेमे तुम्‍हाला मुळातुनच हलवून सोडतात. अनुराग कश्‍यप यांचा गुलाल असाच एक सिनेमा. राजकारणाचं भयाण रुप आता आपल्‍यासाठी काही नवं नाही. आणि college politicsही काही लहानसहान बाब नाही राहिलेली आजकाल.
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महिला दिवस है

आज महिला दिवस है और कुछ बच्चियां गर्भ से ही गिरा दी जायेंगी क्यूंकि उसके माता पिता उसके जन्म लेने से असहज हो जायेंगे, उन माता पिताओं को यह भी डर है कि उनके माता पिता एक बेटी जनने से खुश नहीं होंगे. और जब किसी को खुशी ही नहीं होगी तो बेचारी को क्यों [
 
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मेरी तरह आप भी सिगरेट छोड़ दें

मैं सन् १९९४ से सिगरेट पी रहा था, बीच में कई बार छोड़ा भी पर कभी भी पूरी तरह नहीं छूटा. लेकिन इस बार लगभग दो महीने हो गए इस बला को हाथ नहीं लगाया, आप कह सकते हैं कि मुँह नहीं लगाया. मुझे हमेशा से यह लगता था कि मैं इसे तो जब चाहे [...]
 
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आना है आपको टॉप के ५० में - चरण १

लेखक, गंजेरी और गुंडे गैंग में ही बड़े होते हैं. जितना सॉलिड गैंग उतना ज्यादा विकास. तो कहने का मतलब यह कि गैंग में पहले चमचागिरी कर के घुसिए फिर अपना पाँव फैलाइए, फिर कद बढाइये. पर यह जरूरी है कि आप और हम यह गौर करें कि पेशे में सठियाये हुए ये ब्लोग
 
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IN SEARCH OF OASIS..

A shadow with me all dayNo bodyThis is crazy, this is crazy..Notes of a scintillating fluteNo flutistThis is crazy, this is crazy..Breathtaking verses on paperI was sleepingThis is crazy, this is crazy..Vermilion laden skySunrise or sunset? This is
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सर्वेसर्वा

आज सकाळ चांगली झाली माझी. माझा उजवा हात, माझी बाई ऊगवली वेळेवर. गेले २-४ दिवस माझे जडच गेले जरा. आपलं आजारपण आलं की हमखास ह्‍यांनाही बरं वाटेनासं होतं. आणि न सांगता दांड्‍या मारणं हा तर आपला जन्‍मसिद्‍धं हक्‍कच नाही का. तर अशा ह्‍या मँडम आज उगवल्‍या
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पैसा बोलता है...

आम्‍ही बरेच दिवसांपासून desparately स्‍टाफच्‍या शोधात आहोत. सगळीकडे recession ची बोंब असतांना आम्‍ही इथे स्‍टाफसाठी झटतोय पण कोणी मिळत नाहिय. जो उठतो तो आपला पैशात बोलतोय. अरे आधी कामाचंसुद्‍धा थोडं बोलू यात की. पैसे तर देऊच आम्‍ही. पण...तिथेच तर घोडं
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annonymous...

आपण मातीच्या मनात मिसळून तिचं व्हावं, तिनं आपल्यात मिसळून आपलं व्हावं, अन्‌ असं उमलत रहावं, हे ज्ञानच आकाशाला नाही. ती समजुत आहे पाण्याला. म्हणून माती पाण्याशी खेळते. पाण्यात भिजते. मोहरते. ऋतूमती होते. आभाळाला ती अस्पर्श आहे. तिला त्याला भेटावसं वाटलं
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to my online friends...

आज लागली ही बया हाती. वापरीन वापरीन म्‍हणत मीनलने कधी ही डायरी उघडलीच नाही आणि मीनलचा तिच्‍यावर जीव जडला म्‍हणून मी कधी तिला हात लावला नाही. आज लिहायची ऊर्मी आली आणि ही समोर हजर. As they say it,"I can resist everything but temptation..." २००९ ची
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एका वंशसंहाराची स्मृती

दुसरं महायुद्ध हे अनेक गोष्टींमुळे लक्षात राहतं; पण त्यातला महत्त्वाचा भाग आहे तो ज्यूंच्या वंशसंहाराचा! या साऱ्या कालखंडाचा उल्लेख करायचा झाला, तर तो "न भूतो न भविष्यती' असाच करावा लागेल. सुमारे साठ लाख माणसांची या कालखंडात हत्या झाली. ती हत्या त्या
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तेजशलाका

इरेना सेंडलर यांचं युद्धकाळातलं काम पाहूनच आपण "आकाशाएवढा...' असं म्हणू लागतो. त्यांच्याविषयी विचार करताना बुद्धी, मन- सारंच थिटं पडतं. कोणत्याही प्रकारच्या विचारांच्या चिमटीत त्या गवसेनाशा होतात. त्यांच्यावर कुठलंही "लेबल' चिकटवता येत नाही. पाहता पाहता
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वारी, वारकरी

पंढरीच्या भेटीसाठी निघालेल्या ज्ञानोबा तुकारामांच्या पालख्या आणि हजारो वारकरी यामुळे महाराष्ट्र भावभक्तीच्या आनंदानं कोंदून गेलाय. पांडुरंगाच्या समचरणी लीन होण्यासाठी आतुर झालाय. किमान एक हजार वर्षाची परंपरा असणारी ही वारी म्हणजे एक आश्‍चर्यच आहे. हजारो
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वाट चुकलेली दिशा

कुणाहीव्यक्तीची कोणतीही वर्तणूक बदलायची असेल, तर त्या व्यक्तीस स्वतःला तसं वाटल्याशिवाय आणि तिनं तो निर्णय स्वतः घेतल्याशिवाय ती वर्तणूक कुणीही बदलू शकत नाही. बाहेरील दबाव, धमक्‍या काहीही उपयोगी पडत नाहीत. वेश्‍या व्यवसायात असणाऱ्या स्त्रियांबाबत हेच
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...खुनापर्यंत का यावं?

जगण्याचा वाढता वेग, तीव्र स्पर्धा, सगळं काही स्वत:ला मिळायलाच हवं असा अट्टहास, त्यातून बदलणारे सूर, बदलती कुटुंब व्यवस्था, नवी लाइफस्टाइल या सगळ्यातून कमी होत जाणारा इमोशनल कोशंट... दिल्लीत नुकत्याच झालेल्या आरुषीच्या आणि मुंबईतील नीरज ग्रोव्हरच्या
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माSSSज!!

माझ्या कोणत्याही वक्तव्यावर अथवा वर्तनावर माझ्या मित्रांची ही ठरलेली प्रतिक्रीया असते. किंबहुना त्यांना आता इतकी सवय झाली आहे की मला शिंकं आली तरी "माSSSज!!" असं ओरडायला ते मागे पुढे पाहत नाहीत. मी काही बोललो तर त्यात माज असतो, मी काही नाही बोललो तरी तो
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हॅलो ब्रदर!

बंधुत्व म्हणजे "नात्याने बांधलेले'. आपल्याकडे मैत्रीचा उ"जिवाभावाची मैत्री' असा केला जातो, ज्यात बंधुता आहे. ही भावना गेल्या कित्येक शतकांपासून आपल्याकडे दृढ आहे. अलीकडच्या जागतिकीकरणामुळे बंधुत्वाला वैश्‍विकतेची जोड मिळाली आहे, इतकेच.विनायक
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राम नदी किनारे मेरो गाव सावरे आजय्यो, सावरे आजय्यो.

अहो फेकाडे भावोजी, ऐकले का ? आपल्या पुण्यात म्हणे राम नदी चक्क गिळकृत झाली, तिला म्हणे अनिर्बंध अतिक्रमणांची मगर "मिठी" बसली.अग मीने, मीने , मीने, तु म्हणतेस तरी काय ? आता पर्यंत फक्त सरस्वती नदी लुप्त झाल्याचे वाचले होते, हा त्यातलाच प्रकार की काय ? पण