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यादों के पल

जीवन की रेल पेल मेंहर संघर्ष को झेलतेहर सुख दुःख को सहतेकभी मैंने चाही नही इनसे मुक्तिपर कभी बैठे बैठे यूं ही अचानकजब भी याद आई तुम्हारीतब यह मन आज भीभीगने सा लगता हैचटकने लगते हैं तन मन मेंजैसे मोंगारे के फूलऔर जैसेसर्दी से कांपते बदन मेंतेरी याद का
 
रंजना [रंजू भाटिया]
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खाली किताब

पढ़ रही हूँज़िन्दगी की किताबआहिस्ता -आहिस्तावर्क दर वर्कपन्ना दर पन्नालफ्ज़ बा लफ्ज़फिर इस केएक -एकहर्फ को उतारूँअपने जलते हुए सीने मेंऔर इस तरह बीता दूँअपनी लम्बी ज़िन्दगी कीतन्हा रात ..वर्ना यह अँधेरेमुझे अपने में समेट करखाली किताब सा कर देंगे !!!रंजना
 
रंजना [रंजू भाटिया]
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