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अपने अपने प्यार की परिभाषा

ना जाने किसकी तलाश मेंजन्मों से भटकती रही हूँ मैंअपनी रूह से तेरे दिल की धड़कन तकअपना नाम पढ़ती रही हूँ मैं....लिखा जब भी कोई गीत या ग़ज़लतू ही लफ़्ज़ों का लिबास पहने मेरी कलम से उतरा हैयूँ चुपके से ख़ामोशी से तेरे क़दमो की आहटहर गुजरते लम्हे में सुनती
 
रंजना [रंजू भाटिया]
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लफ्ज़ बिखरे हुए ...

१)सपने देखनाबंद पलकों मेंक्यों कि उन में उड़ने केकुछ पर होंगेदुनिया देखनातो आँख खोल केयहाँ उनसपनो के टूटे पर होंगे२)रात के घने अंधेरेकैसे सब फ़र्कमिटा जाते हैंअलग अलग वजूदअलग राह केमुसाफिर की परछाई कोएक कर जाते हैंरोशन होते हीहर उजाले मेंयह छिटक करअलग हो
 
रंजना [रंजू भाटिया]
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प्यार -एक एहसास

कैसे लिखूं मैं तेरे लिए,जबकि मैं जानती हूँकि तुझ तक पहुँचने के बादविचार शून्य हो जाते हैंऔर कल्पनाएँ ........वो तो न जानेकिस ताखे परबैठ जाती हैऔर देखो ...मैं यूँ ही अलसाई हुई सीउसी ताखे पर बैठी हुईदेखती रहती हूँबस देखती रहती हूँकैसे लिखूं मैं तेरे
 
रंजना [रंजू भाटिया]
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तेरे छूने से

तेरे छुने से बरसो बाद मेरा मौन टूटा है एक पर्दा सा था तन मन पर मेरे तेरे छुने से वो भ्रम जाल टूटा हैआज बरसो बाद दिल में प्यार फूटा है !!हिमनदी सी जमी हुई थी मैं तेरे छुने से एक गर्माहट हुई सोई हुई तितलियों के पंख में फिर से कोई अकूलाहट हुई दिल में फिर से
 
रंजना [रंजू भाटिया]