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जीवन वृक्ष !

नव पल्लव साअद्भुत बचपन और चलेदो चार कदम तो डाल पकी औ'बन गया पौधा,अपने पैरों खड़ा हुआफिर   तो जीवन के चरणों सानित नव विकसित किशोर, युवा सावृक्ष  वही सम्पूर्ण हुआ.शाखों पे शाखेंपल्लव की उस घनी छाँव में अपने ही पौधों को पालाआया माली काट
 
रेखा श्रीवास्तव
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प्यार ही तो है .........

चन्दा को चांदनी से सूरज को रोशनी सेबादल को बूंदों से  प्यार ही तो है पेड़ों को साए से धरती को आस्मां सेईश्वर को भक्तों से  प्यार ही तो है  सागर अपने तट से बादल अपने पथ से वायु अपने वेग
 
ana
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तेरे अश्को के............

तेरे अश्को के दामन सेकुछ बूँदें चुरा लूंतेरे जुल्फों के साए मेंजीवन गुज़ार दूं  तेरे अधरों की मुस्कान परजां निसार दूंदिल की माने तो तन मन बिसार दूंपर तुझको नहीं है इल्ममेरे प्यार कातू तो है बेखबर नहीं है बेवफासमझोगी जिस दिन तुममेरे  प्यार
 
ana
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आपका इंतज़ार है.

सच बोलो तो संकट में फंसता है प्राणपर झूट के तो नहीं होते है पाँवगुंडागर्दी , चोरी , लूटपाटत्रस्त है देश इन सबसे आजकहाँ है वो जो सुधारेंगे देश कोऐसा ही कुछ लिया था प्रण बढ़ाकर आवेश कोपर ऐसा कुछ हमें द्रष्टव्य न हुआदेश तो और भी पतन की ओर
 
ana
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क्या लिखूं .............................

       क्या लिखूं आज समझ न आये कविता , कहानी या ग़ज़ल वर्ण, छंद लय हाथ न आये स्वयं रचूं या करूँ नक़ल पर रचना अपने आप जो आये उसकी महत्ता ही निराली है शब्द जो स्वयं रच जाए अपनी रचना वो कहलाती
 
ana
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आए महंत वसंत

आए महंत वसंतमखमल के झूल पड़े हाथी-सा टीलाबैठे किंशुक छत्र लगा बाँध पाग पीलाचंवर सदृश डोल रहे सरसों के सर अनंतआए महंत वसंतश्रद्धानत तरुओं की अंजलि से झरे पातकोंपल के मुँदे नयन थर-थर-थर पुलक गातअगरु धूम लिए घूम रहे सुमन दिग-दिगंतआए महंत वसंतखड़ खड़ खड़ताल
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कल और आज

अभी कल तकगालियाँ देते तुम्हेंहताश खेतिहर,अभी कल तकधूल में नहाते थेगोरैयों के झुंड,अभी कल तकपथराई हुई थ‍ीधनहर खेतों की माटी,अभी कल तकधरती की कोख मेंदुबके पेड़ थे मेंढक,अभी कल तकउदास और बदरंग था आसमान!और आजऊपर-ही-ऊपर तन गए हैंतम्हारे तंबू,और आजछमका रही है
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सन्तुष्टि…….

वह बोला मेरे खेतों में सोना है मैं हँसी ये सोच कर कि यह अक्ल से कितना बौना है सोना होता,तो क्या इसके कपड़ों में पैबन्द होता ? वह भी तुरंत मुस्कराया और बोला …….बहन जी , खेतों में नीचे का सोना तो सरकार का है ऊपर धनवान का है मुझे तो अपना सोच कर
 
Dr. Veena Srivastava
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रूठे हुए कुछ शब्द

कुछ शब्द जिंदगी से गायब हो गए हैं ...बहुत चुप चाप न जाने कहा चले गए है रूठ कर ....न मेरे पास हैं ...न उसके पास और तुम्हारे पास भी नही मिले वोउन शब्दों का अकाल है या किसी ने आपातकाल लागू कर दिया है अक्षरों पर की जुड़कर वो शब्द बन ही न
 
हिमानी
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पुकार.....

चलो उन पर्वतों के ऊपर... सबसे ऊपर जहाँ सिर्फ आसमान है, और या फिर खुदा है, आसमानों के भी ऊपर. अब पुकारों उन्हें, उम्मीद है.... यहीं हो पायेगी उनसे बातें, मांगों जो भी चाहते हो, मांगों जिसे भी चाहते हो, मांगों फूल, खुशियाँ, प्यार, ताजी हवा, समय पर बारिश,
 
RAKESH JAJVALYA राकेश जाज्वल्य
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याचना

मेरी ख़ामोशी का ये अर्थ नही की तुम सताओगी तुम्हारी जुस्तजू या फिर तुम ही तुम याद आओगी वो तो मै था की जब तुम थी खडी मेरे ही आंगन में मै पहचाना नही की तुम ही जो आती हो सपनो में खता मेरी बस इतनी थी की रोका था नही तुमको समझ
 
ana
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विलम्ब न करना तुरंत आना

विलम्ब न करना तुरंत आना छूटा साथ अधीर रहेगा होंठों पर कुछ चन्दन बाकी है अभी तो सांस महक रही है बहकी सांस अधीर रहेगी विलम्ब न करना तुरंत आना अभी तो आँखें बंद हैं सांझे स्वप्न बह रहे हैं बंद आँखें खुल न पाएंगी विलम्ब न करना तुरंत आना अभी तो हाथ भरे थे [...]
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बदलती तस्वीर

ये है दुनिया की बदलती तस्वीरकभी था आपस में सद्भावपरिवार में था एका नहीं था टकरावबच्चों से रहता था घर  गुलज़ारक्यों न हो होता था जो संयुक्त परिवारपर ये तो रही बीते दिनों की बातअब तो परिवार शतरंज बिछते है बिसातकौन किसको पछाड़े और बिगाड़े बनते हुए
 
ana
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मंज़िल चलकर आयेगी तुम्हारे पास

अंधेरा बहुत गहरा होतो समझनासुबह क़रीब हैलड़ना नहीं तमस सेअपनी शक्ति जाया मत करना शून्य में इंतज़ार करना सूर्य के उगने काअंधेरा ख़ुद-ब-ख़ुदभाग खड़ा होगातुम्हारे रास्ते सेदुःख जब भी आएघबराना नहीं, विचलित मत होना सुख पास ही खड़ादेख रहा होगातुम्हारी बेचैनी
 
डा.सुभाष राय
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अटल बिहारी वाजपेयी : कवि की उलझन

राह कौन सी जाऊँ मैं? चौराहे पर लुटता चीर चलूँ आखिरी चाल कि बाजी छोड़ विरक्ति सजाऊँ? सपना जन्मा और मर गया मधु ऋतु में ही बाग झर गया तिनके टूटे हुये बटोरुं या नवसृष्टि सजाऊँ मैं? राह कौन सी जाऊँ मैं? दो दिन मिले उधार में घाटों के व्यापार में कौड़ी कौड़ी का
 
स्वार्थ
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प्यार में उम्र का फासला नहीं होता

प्यार में उम्र का फासला नहीं होताप्यार तो प्यार है दिखावा नहीं होता यह तो है बहती धारा अमृत की पीये बिना जीया भी नहीं जाता यह बात मुझे  तब समझ में आयी उम्र के इस पड़ाव में किया जग हसाई मेरी उम्र चालीस एक पुत्र का
 
ana
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तेरे लायक नहीं, जानता हूँ

तेरे लायक नहीं, जनता हूँजो कभी नही हुआवो आज हो गयाजो मेरे पास थावो दिल खो गयातुम जानते हो या न नही, पता नहींपर जो खोया है मैंनेवो है तेरे पास कहींमिल जाये तो लौटा देनातेरे लायक नहीं वोजनता हूँले लूँगा, समझाकर रख लूँगा पास अपने ही
 
संजय भास्कर
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किसी की आँख का आँसू!

आँख से आँसू किसी के यूं ही नहीं झरतेदर्द को पीकर जुबान जब थाम लेते हैं सिसकियों के खौफ सेगम को दबाते हीकिसी के आँख से रुकने का नहीं नाम लेते हैं.पार्क की एकांत बेंच परसुनसान सा कोना पकड़करचुपचाप पी गरल अपमान औ' तिरस्कार काइस
 
रेखा श्रीवास्तव
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मेरे गाँव में आना..................

मेरे गाँव में आना......................जहां नदी इठलाती हुई कहती हैआजा पानी में तर जाये अमृत सा बहता हैमेरे घर का पता ...............आम के पेड़ के पीछेपुराने मंदिर के नीचेजहां भगवान् बसते हैमेरी शिक्षा-दीक्षा..................किताब से बाहर यथार्थ के धरातल
 
ana
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उफ़ ! ये गरमी

खिड़की से झांकती ये चिलचिलाती धूप ये अलसाए से दिन बेरंग-बेरूप सामने है कर्त्तव्य पर्वत-स्वरुप निकलने न दे घर से ये चिलचिलाती धूप ये आंच ये ताप कब होगा समाप्त झुलसती ये गरमी बरस रही है आग धूप के कहर ने तो ले ली कई
 
ana
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अब चलो नींद के घर

सोयी रात के सिरहाने पर जग रहा था चाँद ।चिंता के हाथों को कसके नींद रखी थी बाँध ।ओढ़ ली है थकी आँखों ने  पलकों की चादर ।दफ्तर छोड़ा होश का अब चलो नींद के घर ।अँधेरे ने बेहोशी मेंछेड़ा मन का तार ।दूर सपनों के वादी में बज उठा गिटार ।चित्र साभार गूगल सर्च
 
Indranil Bhattacharjee ........."सैल"
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हाशिये में दर्द !

दर्द को हाशिये में डालो,मुस्कानों के सिलसिले से एक इबारत नयी लिखो,उनके बीच बसबिंदियाँ दर्दों की हों.गर मुस्कानें  कम लगेंखोज लो  बचपन मेंनिर्दोष, खामोश जिंदगियों में  और उनको बाँट लोजग के सारे गमउनके
 
रेखा श्रीवास्तव
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विचारों का बादल...........

विचारों का बादल उमड़ते घुमड़ते आ ही जाते हैशब्द जाल के उधेड़ बुन में जकड़ ही जाते हैव्याकरण की चाशनी में डूब ही जाती हैवर्ण-छंद के लय ताल में पिरो दी जाती हैलेखनी की झुरमुटों से जब निकलता  हैविचार मात्र विचार ही नहीं वांग्मय बन जाता हैकृति ये ज्योत
 
ana
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हमने तो आलने में............

हमने तो आलने में दिए है जलाएये फिर आँखों से धुआं क्यों उठाहमने तो बागों में फूल है खिलायेये फिर फूलों का रंग क्यों उड़ाजागते हम रात से सुबह तलकफिर भी नींद का खुमार क्यों न चढ़ारैन तो रात भर जलता रहापर नैनो ने रात भर ख्वाब न बुनाहम तो तारों पर है चलते
 
ana
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हौसले को कभी टूटने न दें :मानस खत्री

मध्यांतर का समय था. कुछ छात्र विद्यालय के पास से जा रहे थे. तभी एक विद्यार्थी ने दुसरे से कहा की मेरे परिवार का बहुत बुरा हाल है. अभी कुछ ही दिनों पहले मेरे नाना के साथ बहुत बड़ी दुर्घटना हुई है. यह दुर्घटना एक बम धमाके की वजह से हुई है. वो मदन के नाना
 
Manas Khatri
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प्यासी धरती - प्यासे मन!

बंजर धरती दरकन माटी की,दरका देती हैदिल सैकड़ों के.पर क्या करते?गर आंसुओं से बुझती प्यास हर आँखइतना रोती औ'नीर बहा देती, प्यास से पपड़ाये होंठों की प्यासशीतल कर देती.मन में उमड़ते विचारों के बादल इतना बरसातीआकाश में उठी
 
रेखा श्रीवास्तव
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शुक्रिया एे ब्लॉगस्पॉट तेरा बहुत शुक्रिया

मुझे  यह  बताते हुए बहुत ही ख़ुशी हो रही है. आज बलाग जगत में  मेरे फोल्लोवेर्स की संख्या १०० हो गई है  इसी पर एक छोटी सी कविता  पेश करता हूँ आपके सामने शुक्रिया एे ब्लॉगस्पॉटतेरा बहुत शुक्रियामेरे जीवन में एक तरंग लाए हो तुमलगता
 
संजय भास्कर
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खुद की तलाश में

खुद की तलाश में क्यूं भटक रहे हैं। मैं नाम हूं मैं ज़िस्म हूं मैं जान हूं मैं रूह हूं हम किस गली से गुजर रहे हैं। अपना कोई ठिकाना नहीं। अपना कोई फसाना नहीं। अपनी कोई मंजिल नहीं। भटक रहें हैं मायावी जंगल में। सब है पर कुछ भी नहीं।फिर भी तलाश है फिर भी
 
संजय भास्कर
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ताकि तस्वीर, साफ़ दिखती रहे

शिवम मिश्र जी के ब्लॉग "बुरा भला" से एक अच्छी जानकारी मिली कि कल, यानि की १५ मई, शहीद सुखदेव का जन्मदिन है । इत्तफाकन ये दिन मेरा और शिवम मिश्र जी का भी जन्मदिन है ! मुझे यह जानकर बड़ा अच्छा लगा कि मैं अपना जन्मदिन भारत माता के इस सच्चे सपूत सुखदेव के साथ
 
Indranil Bhattacharjee ........."सैल"
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वीरेंद्र हमदम की ग़ज़ल

मित्रों आइये आज वीरेंद्र हमदम की ग़ज़ल सुनते हैं. ये ग़ज़ल साहित्य की मशहूर पत्रिका अभिनव कदम में साया हो चुकी है ---कब किसी को तल्खियाँ अच्छी लगींभूख थी तो रोटियां अच्छी लगीं जल उठे मेरी मशक्कत के चिरागपत्थरों की सख्तियाँ अच्छी लगींक्यों रहें कमजोर
 
डा.सुभाष राय
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"सोचा करता हूँ"

मैं खिड़की पर बैठा अक्सर,बाहर को देखा करता हूँ।अपने जीवन की सच्चाई,पढने की सोचा करता हूँ॥क्षण-भंगुर है जीवन मेरा,एस पल है, उस पल है नहीं,अंतर्मन की में गहराई,छूने की सोचा करता हूँ॥कुदरत ने क्या क्या है बनाया,नभ, धरती और चाँद सितारे,दूर गगन में सूरज
 
Deepak Shukla
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तब, माँ, तेरी याद आती है

वैसे तो माँ को याद करने के लिए कोई खास दिन की ज़रूरत नहीं होती है । माँ हर पल दिल में होती है । फिर भी आज जब घर से बहुत दूर हूँ, माँ को देखे बहुत दिन हो गया, तब, बहुत जी करता है की बस सब कुछ छोड कर  माँ के पास जाऊं और उनके गोद में सर रखकर सो जाऊं ।
 
Indranil Bhattacharjee ........."सैल"
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मुझे माफ कर देना

मुझे माफ कर देना उतर सकी न पूरी तेरी मुहब्बत के क्षितिज पर हाँ, मुझे ले बैठा लज्जा, शर्म और बदनामी का डर जो किए थे वादे निकले रेत के टीले या पानी पे खींची लकीर जो तुम समझो क्षमा चाहती हूँ, जो, तेरे लिए जमाने से मैं लड़ न सकी कदम से कदम और कंधे से मिला
 
संजय भास्कर
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माँ के इस आँचल मैं

माँ के इस आँचल मैं प्यार का सकून मिलता हैजीने की तमन्नाओ मेंनया अंदाज़ मिलता हैयू तो दोलत की छांवमें लोग जीते और मरते हैमगर माँ के इस आँचल मेंफलते फूलते रहते हैयू बड़े हो कर भूल जाते हैमाँ बाप का प्यारलेकिन जीवन में काम आता हैआदर्श और उनका प्यार |:-
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डा. एम.एस. परिहार के दो समसामयिक गीत

एक और संग्रामआजादी है अभी अधूरीपाये न जनता रोटी पूरी।तंत्र लोक से दूर हुआ हैअवमूल्यन भरपूर हुआ है।।आज देश टुकड़ो में बंटता जीना हुआ हराम।अभी देश को लड़ना होगा एक और संग्राम।।सपनों की लाशें आवाराबेबस का है नहीं गुजारा।माली ने गुलशन मसला हैगांधी का भारत
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हम तो कीमत कि दाद लिखे: कनिष्क कश्यप

मेरी राखों कि नीलामी की तुमने जो कीमत लगायी है वह कीमत दुनिया पूछेगी हम तो कीमत कि दाद लिखे
 
kanishka kashyap
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बुनियाद नहीं बदलती…… : रश्मि प्रभा

अपने सुकून के लिए समुद्र मंथन मत करो हर बार अमृत नहीं निकलता और गर निकल भी जाए तो उसे असुरों को समर्पित करना तुम्हारी विशालता नहीं कायरता है ! तुम अच्छी तरह जानते हो ढाँचे के क्षणिक रद्दोबदल से बुनियाद नहीं बदलती !
 
Rashmi Prabha
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जारी है सिलसिला सरहदों पर

 दो आतंकी ढेर दो जवान शहीद कुल मिलाकर चार घरों में अँधेरा दो इधर तो दो घर उधर जारी है अभी सिलसिला सरहदों पर  ..आमीन..
 
संजय भास्कर
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मोक्ष: रश्मि प्रभा

वो तुम्हारे अपने नहीं थे जिन्हें साथ लेकर तुमने सपने सजाये सूरज मिलते सब अपनी रौशनी के आगे एक रेखा खींच ही देते हैं ! शिकायत का क्या मूल्य
 
kanishka kashyap
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पंखो का शरीर

मेरे कमरे के सामने वालेघर के पीछेयानी मेरे कमरे के सामनेएक कबूतर के जोड़े ने गीज़र के उपरडेरा बसाया है ----कई दिनों बाद आजमैंने उन्हें गौर से देखा -कबूतरी परेशान हैकबूतर लाचार हैकबूतरी पेट से हैकबूतर उसके पास हैकबूतरी को एक पल चैन नहीं उसके पंखो में
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