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बरसाती ख़याल कुछ यू भी

मेघा आज फिर टुटके बरसे तुम मीत से माटी से ‘महक’ ऊठी , इश्क में सराबोर निकली | ================================ ये क्या हुआ ‘महक’, दीवानगी की सारी हदे पार कर ली सावन में बरसी हर बूँद तुने,अपने अंजुरी में भर ली | =================
 
mehhekk
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बाजार में सजा स्वयंवर-हास्य व्यंग्य (bazar men svyanvar-hindi hasya vyangya)

वैसे तो भारतीय संस्कृति और संस्कारों में लोगों को ढेर सारे दोष दिखाई देते हैं पर फिर भी वह उसमें तमाम कथ्यों और तथ्यों की पुनरावृत्ति करते वही दिखाई देते हैं। भारतीय ग्रंथों में वर्णित हैं स्वयंवर की प्रथा। इसमें लड़की स्वेच्छा से वर का चुनाव करती है।
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इन फूलों की बारिश में

इन फूलों की बारिश में भीग लेते है हम भी मोहोब्बत के इत्र की महक जरा बदन पर चढा लूँ अगले मौसम तक फिर ये ताजगी रहेगी मन में . ——————————————————
 
mehhekk
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ये इश्क भी क्या क्या खता करवाता है

ये इश्क भी क्या क्या खता करवाता है महबूब -ओ-दिल पे शक की सुइयां दिखाए माना उनसा इमानदार न कोई कायनात में वक़्त के साथ चलना उन्हें आता नहीं मुलाकात की जगह हम मौजूद पहले से राह चलते लोगों की सवालिया नज़र का क्या जवाब दे ये कैसा इम्तेहान लेते वो हमारा पर
 
mehhekk
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तुझे इश्क़ हो ऐसा ख़ुदा करे

तुझे इश्क़ हो ऐसा ख़ुदा करे कोई तुझ को उस से जुदा करे तेरे होंट हँसना भूल जाएँ तेरी आँख पुर-नम रहा करे तू उसकी बातें किया करे तू उसकी बातें सुना करे उसे देख कर तू रुक पड़े वह नज़र झुका के चला करे तुझे हिज्र की वह घड़ी लगे तू मिलन की हर पल दुआ करे तेरे ख़्
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