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हवा तो हवा है

हर जगह वो चलती हैवो हमारी-तुम्हारी सांस नहींजो सरहदों में सिसकती हैईश्वर की दृष्टिहै समान सब परजंगल और शहर में वोभेद नहीं करती हैयूँ निकालो तेलतो तेल निकलता नहीं हैऔर अब निकली है धारतो रोके न रूकती हैमरने को तो मरते हैंहज़ारों लोग रोज़लेकिन उड़नेवालों के
 
Rahul Upadhyaya
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ज़िंदगी, मौत और तलाक़

ज़िंदगी, मौत और तलाक़एक ही तस्वीर के तीन पहलू हैंएक मेंवो खींची जाती हैदूसरे मेंसजाई जाती हैतीसरे मेंफाड़ दी जाती है=॰=ज़िंदगी मिलती हैमौत आती हैतलाक़ होता हैवैसे हीजैसेदोस्त मिलते हैंरात आती हैऔरसवेरा होता है=॰=जब कोई सब कुछ छीन लेता हैतो उसे तलाक़ "देना"
 
Rahul Upadhyaya
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मनोदशा

लाल रोशनी केदो गोलों के पीछेमैं खुद को इतना सुरक्षित समझता हूँकि60 मील प्रति घंटे की रफ़्तार से चल रही कार कीस्टीयरिंग व्हील पकड़ेमैंबेगम अख़्तर कीअलसाती हुई ठुमरीबड़ी तन्मयता के साथसुन सकता हूँसुरक्षाअसुरक्षाकल का भयआज की चिंताये सबमनगढ़ंत हैंयापरिवेश के जाए
 
Rahul Upadhyaya
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ब्राउनियन मोशन में जीव-सार सारा

झोपड़ी के दीप सा टिमटिमाता ताराभटकता है नभ में ज्यों भटके शिकाराभटकना ही जीव का दीन-ओ-धरम हैब्राउनियन मोशन में जीव-सार साराभटकना न होता तो पाषाण होतेन हिलते, न डुलते, न होते बीच धाराजीवन है जीना तो बहना है निश्चितजीते जी किसी को न मिलता किनारामोक्ष की आस
 
Rahul Upadhyaya
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कैलेंडर और घड़ी

कैलेंडर है एकतिथियाँ कई हैंइनमें स्थितपरिस्थितियाँ कई हैंकैलेंडर से छोटीकैलेंडर से बड़ीदुनिया में नहींकोई ऐसी किताबबारह पन्नों के बीच मेंजो सौंप दे सारा जहाँबच्चों की छुट्टीबुआ का ब्याहग्वाले का दूधधोबी की लिस्टपड़ोसी का डिनरमौसी का नम्बरसोख लेता है सब का
 
Rahul Upadhyaya
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रोशनी है इतनी कि आँख नहीं लगती है

सारा दिन गुज़र जाता हैऔर प्यास नहीं लगती हैदेख के दुश्मन भीतन में आग नहीं लगती हैऐसा भी नहीं किमैं एक रोबोट हूँ यारोकम्बख़्त रोशनी है इतनीकि आँख नहीं लगती हैजीने के तो वैसेकई तरीके हैं लेकिनअपनी ही तबियतकुछ खास नहीं लगती हैआएगा वो दिनजब वो ढूंढेगी
 
Rahul Upadhyaya
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जला है कोई और मैं आग लगाने लगा हूँ

जला है कोई और मैं आग लगाने लगा हूँमरा है कोई और मैं गीत सुनाने लगा हूँकवि हूँ कवि का धर्म निभाऊँगा ज़रूरदुनिया के ग़म को भुनाने लगा हूँऐसा नहीं कि पहले लड़ाई-झगड़े होते नहीं थेअब हर रंजिश को जामा नया पहनाने लगा हूँये कौम कौम नहीं, है दुश्मन हमारीकह कह के
 
Rahul Upadhyaya
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१ जनवरी का इंतज़ार

मैं हर साल१ जनवरी काबड़ी बेसब्री से इंतज़ार करता हूँआँखें फ़ाड़े-फ़ाड़े ताकता रहता हूँकि जैसे ही वो दिखेमैं उसे सीने से लगा लूँऔर एक पल के लिए भी उसे अलग न होने दूँजैसेकोईबस स्टॉप कीबेंच परबटुआब्लैकबेरीचश्माटोपीयाछतरीरख कर भूल जाएऔर याद आने परउल्टे पाँवदूसरी
 
Rahul Upadhyaya
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मेरी भूख

हाथ में मेरे पचासों लकीरें एक भी उनमें नहीं है लकी रे करता न खिदमत न सहता हुकूमत एक जो किस्मत होती भली रे खा के भी हलवा खा के भी पूड़ी भूख ये मेरी मिटती नहीं रे दिखता है जोगी होती जलन है खा के भी सूखी रहता सुखी रे कहता है जोगी सुन बात मेरी ना तू अनलकी
 
Rahul Upadhyaya
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जहाँ हूँ मैं वहीं उसका ठिकाना है

जहाँ से हम आए हैं वहीं हमें जाना हैं ज़मीं से आए हैं ज़मी में समाना है रंगीं हो पत्ते या काले हो बादल अंत तो सभी का वही पुराना है बड़े से आसमां में मैं ढूंढता था जिसको टेका जो माथा तो उसे यहीं पे जाना है अब गली-गली हाथ फैलाए मैं भीख मांगूँगा नहीं क्योंक
 
Rahul Upadhyaya
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अर्जुन आँखें

हाईवे बने और गाँव के गाँवउजड़ गएलोगफ़र्राटे सेहवा से बातें करते-करतेउपर-उपर से निकल गएजब से जी-पी-एस आयासमंदर, झील, तालाब, झरनेसब के सब ओझल होते जा रहे हैंइस्कान का मंदिरबच्चों का स्कूलरंग बदलते पत्तेसामने होते हुए भीदिखाई नहीं देतेहमारीअर्जुन आँखेंगड़ी
 
Rahul Upadhyaya
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महल एक रेत का

टूट गया जब रेत महल बच्चे का दिल गया दहल मिला एक नया खिलौना बच्चे का दिल गया बहल आया एक शिशु चपल रेत समेट बनाया महल बार बार रेत महल बनता रहा, बिगड़ता रहा बन बन के बिगड़ता रहा रेत किसी पर न बिगड़ी किस्मत समझ सब सहती रही वाह री कुदरत, ये कैसी फ़ितरत? समंदर
 
Rahul Upadhyaya
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मौत का मीटर - एक समाचार, दो कविताएँ

समाचार - 93 वर्षीय अमीर व्यक्ति की अपने ही घर में ठंड से ठिठुर कर मौत हो गई। कारण? वो अकेला था। पूरा समाचार यहाँ देखें - http://mere--words.blogspot.com/2009/02/blog-post.html रहते हैं यारो वे भी उदास रोटी, कपड़ा, घर जिनके पास रहते हैं यारो वे भी उदास
 
Rahul Upadhyaya
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