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तसलीमा नसरीन और मक़बूल फ़िदा हुसैन

अमर ज्‍योति तसलीमा नसरीन एक बार फिर चरचा में हैं। इस बार मुद्दा है कर्नाटक के किसी अख़बार में प्रकाशित उनके किसी लेख का कथित अनुवाद। कथित इस लिये क्योंकि स्वयं तसलीमा ने उक्त अख़बार के लिये ऐसा कोई लेख लिखने से इन्कार किया है। उन्होंने लिखा या नहीं यह एक
टैग: indian culture
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“संस्कृति के ठेकेदारो, कहां हो”

बड़ी अजीब बात है. कोई सामने आता ही नहीं. अभी दो तीन महीने पहले ही तो ढोल नगाड़े लेकर सच का सामना के ख़िलाफ़ जंग छेड़ी गई थी. अब कार्यक्रम बंद हो गया तो कोई कुछ बोलता ही नहीं. बोले भी तो कैसे. तब तो संस्कृति की दुहाई दी जा रही थी. बड़े बड़े जुमले कसे
 
अनवर जमाल अशरफ़