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जुगनू

बहुत पहले दुनिया में सिर्फ़ रात थी, मेरी कंखौरियों में मिट्टी के दिए चिपके थे. मैं उड़ने के लिए हाथ उठाता, दिए अपने आप बल उठते. रोशनी की फुहार उठती, बरसती. मैं हाथ नीचे करता, अंधेरा फिर हो जाता. मुझे इस तरह देखने के बाद ईश्‍वर ने जुगनू बनाए. फिर भी उड़ने
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अंधेरे में कोहरा

हर पलंग के पास एक बुरा सपना होता है. कमर टिकाते ही जकड़ ले. हर घर में कुछ बूढ़ी रूहें रहती हैं. रात की नीरवता में किचन में कॉफ़ी की गिरी बोतल उठाने में पीठ पर आ लदें. हर नींद में एक ग़फ़लत होती है और हर ग़फ़लत एक भय को साथ ले आती है. सच होने का बीज ह
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जो चाहो, मानो मुझे...

मुझे जो चाहे, माना जा सकता है। जीवन में कुछ लोग अभी भी ऐसे हैं, जिन्हें लगता है, चलते-चलते कहीं गिर न जाऊं। और कुछ ऐसे भी हैं, जो लड़ पड़ते हैं, कभी नहीं गिरेगा। मैं दोनों को समझा दूं कि गिरना कभी भी हो सकता है। और क़तई ज़रूरी नहीं कि लड़खड़ाहट हर ब
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