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चेतक की समाधि से-1

बैसाख का महिना निराश और हैरान होकर पसीना बहाता हुआ उतर रहा था और हमारी रेलगाड़ी अरावली की घाटियों में हांफती हुई चढ़ रही थी | रेलगाड़ी से भी तेज मेरा मन उस हल्दीघाटी को देखने की चाह में उड़ा जा रहा था | वह माटी कैसी होगी, जिस पर स्वातन्त्र्य -प्रेम और
 
क्षत्रिय
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