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सन्तुष्टि…….

वह बोला मेरे खेतों में सोना है मैं हँसी ये सोच कर कि यह अक्ल से कितना बौना है सोना होता,तो क्या इसके कपड़ों में पैबन्द होता ? वह भी तुरंत मुस्कराया और बोला …….बहन जी , खेतों में नीचे का सोना तो सरकार का है ऊपर धनवान का है मुझे तो अपना सोच कर
 
Dr. Veena Srivastava
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तुम नदी हो……..

तुम नदी हो बहो……. बहना तो प्रकृति है और तुम्हारी नियति भी जो चाहो बहा कर ले जाओ तिनका हो या काठ मर्ज़ी तुम्हारी तुम्हारा वेग तुम्हारा सम्बल है और,अपने प्रिय सागर से मिलने की आकुलता भी इसी आकुलता ने न जाने कितने पत्थर तराशे और न जाने कितने
 
Dr. Veena Srivastava
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आओ चलो बोएं ……..

आओ चलो बोएं संवेदना के बीज खेतों में नहीं पगडंडियों के किनारे,बगीचों में …. जहाँ सैर करने निकलते हैं लोग सुबह-शाम और सबसे पहले तो अपने-अपने आँगन में लगी तुलसी के घरुए में अंकुरण से फैलेगी वो खुशबु, वो महक जो दिल ओ दिमाग के पर्यावरण को रखेगी मुक्त
 
Dr. Veena Srivastava
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बाउजी

बाउजी,हम सबके बाउजी बैठक मैं बैठे हुक्का पीते बाउजी शतरंज खेलते बाउजी कभी न हारे बाउजी शेर कहते बाउजी नज़्म लिखते बाउजी ग़ज़लें जब उनकी तरन्नुम में गाती पाँच का सिक्का ईनाम देते बाउजी बीड़ी के बण्डल से जब कूपन चुराती जाने कैसे जान लेते बाउजी पाई-पाई का हिसाब
 
Dr. Veena Srivastava
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मैं सिर्फ सुनती रही….कोरियन पुस्तक में छपी जिसका कोरियन अनुवाद सत्यांशु ने किया .

जब -जब मैं छत पर आती बादलों में छुप जाता था चाँद ऐसा तुम कहते थे ……. जब-जब मैं हँसती-खिलखिलाती तब-तब आँगन में झरता हरसिंगार ऐसा तुम कहते थे ……. जब-जब मैं मायूस होती पत्तों से झरती ओस ऐसा तुम कहते थे ……. पर\ जब मैंने
 
Dr. Veena Srivastava
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पौध ……

बेरोजगारों की पौध तैयार कर रहे हैं अधिकांश स्ववित्त-पोषित महाविद्यालय ……..नक़ल करा के दुकान तो चलाई जा सकती है परन्तु योग्य पौध तो योग्य शिक्षक ही शिक्षा के मंदिर में तैयार कर सकता है .बच्चों के भविष्य के प्रति हम शिक्षकों को अपनी जवाबदेही
 
satyanshu
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पौध ….

बेरोजगारों की पौध तैयार कर रहे हैं अधिकांश स्ववित्त-पोषित महाविद्यालय……… नक़ल करा कर दुकान चलाई जा सकती है परन्तु योग्य पौध तो योग्य शिक्षक शिक्षा के मंदिर में ही तैयार कर सकते हैं .बच्चों के भविष्य के प्रति हम शिक्षकों को भी अपनी
 
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माँ के आंसुओं से लिखी ये इबारत ……

माँ, मेरी माँ,जिसके आंसुओं से लिखी है इबारत मैंने गुब्बारे सा फूटा था गुबार , रोती रही थी अनवरत धीरे-धीरे ….जी हल्का हुआ सिसकियों के बीच डबडबाते आंसुओं और थरथराते अधरों से बही थी वेदना…. ढाढस ने तोड़ा था बाँध , बौनी हो गई थी संवेदना परम्पराओं
 
satyanshu
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माननीय कांशीरामजी के जन्मदिवस पर ……

सर्वजन हिताय सर्वजन सुखाय मनरेगा……. मनरेगा का धन ग़रीबों के पेट में नहीं माननीयों की तिजोरी में ‘ मजदूरों के बजाय जे सी बी मशीनों से नहरों की भराई करा श्रमदान घोषित ‘ और आप कहते हैं
 
satyanshu
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जब मैं चौंकी ….

एक छोटी सी बच्ची को सिर पर गोबर से भरी डलिया लिए हुए जब मैंने देखा ‘ मैं तब नहीं चौंकी चौंकी तब …जब मैंने उसे एक स्कूल के सामने अन्दर पढ़ते हुए बच्चों को एकटक निहारते हुए पाया हांलाकि उसकी पीठ जरूर मेरी ओर थी लेकिन मैं…… उसके
 
satyanshu
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आज की नई पीढ़ी के लिए …..

पश्चिम की आंधी में देशी बच्चे बहने आज लगे हैं साठ लाख का बुरा है क्या ये पैकेज कहने आज लगे हैं लैपटॉप मोबाइल इन्टरनेट ही अब इनकी दुनियाँ है गूगल याहू डॉट कॉम के घर में रहने आज लगे हैं बुलंदियां छू रहे हो तुम जिन बुनियादों पर खड़े हुए हो मुड़कर तो देखो वो
 
satyanshu
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महिला दिवस पर

नारी जीवन आज तुम्हारे यही मायने पंख लगाकर खुले गगन में उड़ी उड़ानें आसमान हो, अंतरिक्ष या पार क्षितिज के अब सब लगते घर जैसे जाने पहचाने नारी हो नर से आगे या नर नारी से आगे कोई फरक नहीं पड़ता जो टूट न पायें धागे आसमान विस्तृत सागर सी जब सोच हमारी होगी तब
 
satyanshu
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“Welcome To aMar LiNk” “আমার লিংক’এ স্বাগতম”

Welcome To aMar LiNK । আমার লিংক-এ সবাইকে স্বাগতম। আমার লিংক কি? প্রথমেই বলে নেই এই সাইটির নাম Amar Link “আমার লিংক” অর্থাৎ এটি সাইটটি একান্তই আপনার সাইট। তাই আপনিও বলার সম্পূর্ন স্বাধীনত পাচ্ছেন এটি “aMar LiNK” “আমার
 
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