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संत कबीर वाणी-खोटी हाट में गांठ का हीरा न खोलें (sant kabir vani-heera aur hat)

हीरा परखै जौहरी, शब्दहि परखै साध।कबीर परखै साधु को, ताका मता अगाध।।संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि हीरे की परख जौहरी करता है तो शब्द की परख साधु ही कर सकता है। जो साधु को परख लेता है उसका मत अगाध हो हो जाता है। हीरा तहां न खोलिए, जहं खोटी है हाट।कसि
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श्रीमद्भागवत गीता और ज्योतिष विज्ञान-आलेख (shri madbhagvat geeta and jyotish vigyan-hindi lekh)

भारतीय ज्योतिष विज्ञान का विरोध किसलिये हो रहा है। चंद ज्योतिषी इस आड़ में यहां के लोगों को मूर्ख बना रहे हैं और हम यह जानते हैं। इसे बार बार दोहराने से क्या मतलब है? यहां के लोगों को बेवकूफ समझते हैं और अंग्रेजी शिक्षा पाने के बाद कुछ कथित विद्वान समझते
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संत कबीर वाणी-राम का नाम छोड़ने पर नर्क में वास होता है (ram ka nam-sant kabir vani)

मुख से नाम रटा करैं, निस दिन साधुन संग।कहु धौं कौन कुफेर तें, नाहीं लागत रंग।संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि लोग दिन रात भगवान के नाम का जाप करते हैं, साधुओं के पास जाते हैं ऐसे में किसे दोष दें कि उनके जीवन में रंग नहीं चढ़ता।राम नाम को छाड़ि कर, करे
 
दीपक भारतदीप
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विदुर नीति-अनुशासनहीनता से ऐश्वर्य नष्ट हो जाता है

अर्थानामीश्वरो यः स्यादिन्द्रियाणमीनश्वरः।इन्द्रियाणामनैश्वर्यर्दिश्वर्याद भ्रश्यते हि सः।।हिन्दी में भावार्थ-अधिक धन का स्वामी होने भी इंद्रियों पर अधिकार करने की बजाय उसके वश में हो जाने वाला भी मनुष्य ऐश्वर्य से भ्रष्ट हो जाता है।धर्मार्थोश्यः
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संत कबीर के दोहे-सम्मान की चाहत बनती दुःख कारण (sant kabir ke dohe-samman ki chahat buri)

मान बड़ाई ऊरमी, ये जग का व्यवहार।दीन गरीबी बन्दगी, सतगुरु का उपकार।।संत शिरोमणि कबीरदास का कहना है कि जिस तरह दुनियां का व्यवहार है उससे देखकर तो यही आभास होता है कि मान और बड़ाई दुःख का कारण है। सतगुरु की शरण लेकर उनकी कृपा से जो गरीब असहाय की सहायता करता
 
दीपक भारतदीप
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संत कबीर के दोहे-दूसरे का काम करने पर ही यश मिलना संभव (sant kabir vani-propkar aur yash)

स्वारथ सूका लाकड़ा, छांह बिहना सूल।पीपल परमारथ भजो, सुख सागर को मूल।।संत कबीरदास जी का कहना है कि स्वार्थ तो सूखी लकड़ी के समान हैं जिसमें न तो छाया मिलती है और न ही सुख। एक तरह से वह कांटे की तरह है। इसके विपरीत परमार्थ पीपल के पेड़ के समान हैं जो सुख
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रहीम के दोहे-चिंता तो जीव को ही लील जाती है (rahim ke dohe-chinta aur chita)

रहिमन कठिन चितान ते विंतर करे चित चेत।चिता दहति निर्जीव को, चिंता जीव समेत।।कविवर रहीम कहते हैं कि कठिन चिंताओं का चिंतन करने की अपेक्षा चित पर ध्यान करें क्योंकि चिता तो प्राणहीन शव को दग्ध करती है पर चिंता तो जीवित मनुष्य को ही लील जाती है।रहिमन कबहुं
 
दीपक भारतदीप
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