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मीडिया आपको क्यों बनाए सेलिब्रिटी

हिन्दीबाजी-7~अभिषेक कश्यप*भाग-6 से आगे॰॰॰॰हिंदी के लेखकों-बुद्धिजीवियों की कुछ तकलीफें शाश्वत किस्म की हैं। मगर इनमें शायद सबसे अहम शिकायत यह है कि हमें कोई पूछता नहीं। मतलब एक लेखक और बुद्धिजीवी के तौर पर हमारी कोई आईडेंटिटी नहीं।पिछले हफ्ते मैं तीसीयों
 
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क्लैसिक के बहाने कुछ बातें

हिन्दीबाजी-6~अभिषेक कश्यप*भाग-5 से आगे॰॰॰॰हिंदी की साहित्यिक कृतियों पर लिखी समीक्षाओं-आलोचनाओं में ‘क्लैसिक’ शब्द पर बहुत जोर दिया जाता है। अखबारों के लिए समीक्षा लिखनेवाले कई नवसिखुए तो किसी ऐरे-गैरे के उपन्यास या कविता-संग्रह को क्लैसिक बताने में तनिक
 
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हिंदी में क्यों नहीं होते बेस्टसेलर

हिन्दीबाजी-4~अभिषेक कश्यप*भाग-3 से आगे॰॰॰॰इधर मैंने अंग्रेजी से हिंदी में अनूदित कई बेस्टसेलर पढ़े। इनमें से ज्यादातर सेल्फ-हेल्प पुस्तकें थीं, जिन्हें भोपाल के मंजूल पब्लिशिंग हाउस ने प्रकाशित किया है। पहली बार साल २००३ में मैंने नेपोलियन हिल की ‘थिंक
 
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अजब हिंदी प्रेम की गजब कहानी

हिन्दीबाजी-2~अभिषेक कश्यप*भाग-1 से आगे॰॰॰॰हिंदी शायद संसार की इकलौती ऐसी भाषा है जिसके परजीवी मलाई-रबड़ी पर पलते हैं और श्रमजीवी अभाव, वंचना और अपमान का शिकार होते हैं। हिंदी के परजीवियों ने अपने पराक्रम से यह साबित कर दिया है कि बेईमानी, काहिली, चापलूसी
 
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