0
कौटिल्य दर्शन-कभी पर्वत की तरह सहनशील तो कभी अग्नि की तरह तीक्ष्ण बन जायें
काले सहिष्णुगिंरिवदसहिश्णुश्चय वह्वित्।।स्कन्धेनापि वहेच्छत्रन्प्रियाणि समुदाहरन्।।हिन्दी में भावार्थ-समय आने पर पर्वत के समान सहनशील और अग्नि के समान असहनशील हो जायें। समय पर मित्र के कंधे पर हाथ रखें तो शत्रु पर भी उसका प्रयोग करें।असत्यता निष्ठुरता
Feb 24 2010 08:36 AM



Shuffle








