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अल्लामा इकबाल : बच्चों के लिए (६) : एक मकड़ा और मक्खी

इक दिन किसी मक्खी से यह कहने लगा मकड़ा इस राह से होता है गुजर रोज तुम्हारा लेकिन मेरी कुटिया की न जगी कभी किस्मत भूले से कभी तुमने यहां पाँव न रखा गैरों से न मिली तो कोई बात नहीं है अपनों से मगर चाहिए यूं खिंच के न रहना आओ जो मेरे घर में , तो इज्जत है यह
 
अफ़लातून
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अल्लामा इकबाल : बच्चों के लिए (५) : शहद की मक्खी

इस फूल पे बैठी , कभी उस फूल पे बैठी बतलाओ तो, क्या ढूँढ़ती है शहद की मक्खी ? क्यों आती है , क्या काम है गुलजार में उसका ? ये बात जो समझाओ तो समझें तुम्हे दाना चहकारते फिरते हैं जो गुलशन में परिन्दे क्या शहद की मक्खी की मुलाकात है उनसे ? आशिक है ये कुमरी
 
अफ़लातून
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अल्लामा इकबाल : बच्चों के लिए (३) : हमदर्दी

टहनी पे किसी शजर* की तनहा बुलबुल था कोई उदास बैठा कहता था की रात सर पे आई उड़ने चुगने में दिन गुज़ारा पहुँचूँ किसी तरह आशियाँ* तक हर चीज़ पे छा गया अन्धेरा सुनकर बुलबुल की आहो ज़ारी* जुगनू कोई पास ही से बोला हाज़िर हूँ मदद को जानो-दिल से कीड़ा हूँ अगरचे
 
अफ़लातून
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राह दिखाये कोई रहबर इस गुलिस्तान में…

राह दिखाये कोई रहबर इस गुलिस्तान में जारी रहे अपना सफर इस गुलिस्तान में चंद नसीहते माँ की सुन लो घर से दूर जाने वाले तुझे लगे न किसी की नज़र इस गुलिस्तान में बुजुर्गों की अकीदत में गर अपना सर झुकायेंगे उंचा होगा अपना सर इस गुलिस्तान में इक अरमां मिरे
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नेह का दीपक मैं बारती

नेह का दीपक मैं बारती प्रियतम तोहे पुकारती आजा प्रिय… दिवाली की शाम है छाई पूजन पाठ मैं कर आई आँगन चौखट मुंडेर पे, फुलमालायें मैं संवारती आजा प्रिय… मेहंदी माहवर मैंने लगाये रंगोली भी हैं सजाये, काजल बिंदिया श्रींगार कर रूप सुंदर अपना निख
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अक्सर सोचा करती हूँ

अक्सर सोचा करती हूँ क्यूँ दुनिया से डरती हूँ मन यादों का राह है इससे मैं गुजरती हूँ झील तेरे अहसासों का बनकर नाव उतरती हूँ तू एक दर्पण जिसमे मैं सजती संवरती हूँ तेरे ख्वाबो में आकर मैं हर रोज़ निखरती हूँ क्या तेरे दिल पर कभी बनकर चोट उभरती हूँ तू एक
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तुमसे मांगती मैं अपनी जिंदगी

सुबह से लेकर शाम है लवों पे तेरा ही नाम है भरता है दिल तेरे लिए आंहें कोमल मन में सिर्फ तेरी यादें करती हूँ जब तब तेरा इंतजार लजाती हूँ तुमसे मिलके हरबार पर्वत सा उंचा हो अपना विश्वास ना तोड़ना वादा तुमसे है आस सेवा में तुम्हारे हाज़िर है ये दिल प्यार
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जहाँ चुक जाते हैं शब्द : राजेन्द्र राजन

शब्दों में शब्द जोड़ते मैं वहाँ आ पहुंचा हूं जहां और शब्द नहीं मिलते मैं क्या करूँ अब मैं कैसे लिखूं समय के पृष्ट पर अपनी सबसे जरूरी कविता शब्दों में शब्द जोड़ते जहां चुक जाते हैं शब्द मैं क्या करूं ? क्या मैं वहीं खुद को जोड़ दूं ? मगर क्या अपने शब्
 
अफ़लातून