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विलम्ब न करना तुरंत आना

विलम्ब न करना तुरंत आना छूटा साथ अधीर रहेगा होंठों पर कुछ चन्दन बाकी है अभी तो सांस महक रही है बहकी सांस अधीर रहेगी विलम्ब न करना तुरंत आना अभी तो आँखें बंद हैं सांझे स्वप्न बह रहे हैं बंद आँखें खुल न पाएंगी विलम्ब न करना तुरंत आना अभी तो हाथ भरे थे [...]
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हस्ती

बात बेबात कभी रुत है पलटती मस्ती कभी नशे सी है उतरती बनते बिगड़ते दायरों में टूटती-चढ़ती लहरों सी हस्ती
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ग़ज़ल: इश्क़-ऐ-हकीकी

इश्क़-ऐ-हकीकीहै चाहत इश्क़, यह प्यारा है इश्क़सबब जीने का हमारा है इश्क़दिलों में बसता है ढ़ूंढने से क्या हासिलइस गोल सी दुनिया का किनारा है इश्क़डूबते हो तिनका भी नज़र आए साहिलअंधेरी रात में जलता हुआ तारा है इश्क़दिल तो खोया हुआ है कब से इसके पहलू मेंहमने इस
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कविता: नानी का आंगन

नानी का आंगनवो नानी का आंगन, वो बातें बनाना,कहां भूल पाता हूँ गुज़रा ज़माना।वो 'हाथ के पंखे' की बात अलग थी,अजब था सूकूँ, वो बहार अलग थी,वो नानी का पंखा हिला के सुलाना,कहां भूल पाता हूँ गुज़रा ज़माना।वो सावन का मौसम, बहारो का मौसम,वो मेंढक पकड़ना, वो
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ये शब्द मेरे साथ आजकल कबड्डी खेल रहे है!-(कुंवर जी),(कविता)

ये शब्द मेरे साथ आजकल कबड्डी खेल रहे है!मै सोचता हूँ इस बार तो धर-दबोचुन्गा,तैयार भी हो जाता हूँ पूरी तरह!पर पता ही नहीं चलता कब-कैसे वो बोनस भी ले जाते है!और मै खड़ा देखता रह जाता हूँ!अब मै कसता हूँ लंगोटएक बार फिर,हाथो को लगाता हूँमिट्टी भरपूर,मुट्ठियाँ
 
kunwarji's
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कविता: नानी का आंगन - शाहनवाज़ सिद्दीकी

नानी का आंगनवो नानी का आंगन, वो बातें बनाना,कहां भूल पाता हूँ गुज़रा ज़माना।वो 'हाथ के पंखे' की बात अलग थी,अजब था सूकूँ, वो बहार अलग थी,वो नानी का पंखा हिला के सुलाना।कहां भूल पाता हूँ गुज़रा ज़माना।वो सावन का मौसम, बहारो का मौसम,वो मेंढक पकड़ना, वो
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और यूँ हमारी एक-आध धड़कन और बढ़ जाती है!

कई बार जिंदगी बहुत करीब से गुजर जाती है,अनजाने में हमें जिन्दा होने का एहसास करा जाती है,मौत हमें एक बार फिर से मारने में शरमाती है,और यूँ हमारी एक-आध धड़कन और बढ़ जाती है!भावो और शब्दों की लड़ाई आँखों से झड़ जाती है,समय की पेशानी पर कुछ सलवटें और पड़
 
kunwarji's
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हिंदुस्तान जो की वादियों का देश है

अपना हिंदुस्तान जो की वादियों का देश है तो लीजिये कुछ पंक्तियां पेश हैं ...वे देश मे अलगावादी की भूमिका निभाते हैंखुद को एक समर्पित राष्ट्रवादी बताते हैं।इस लोकतांत्रिक गणराज्य के, समाजवाद हिंदुस्तान केस्वयम्भू साम्यवादी, जनवादी, मनुवादी, इत्यादि इत्
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क्या मैं अच्छा?

आँखों के इशारे झूठे, रिश्ते और सहारे झूठे, हैं सारे के सारे  झूठे, किसको मानूं किसको जानूं? दरिया और किनारे  झूठे,  चाँद दोगला, तारे  झूठे, आँखों के जलधारे  झूठे,&nb
 
Dr Ankur Rastogi
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आजा, मन रंग डालें मिलकर।

आजा, मन रंग डालें मिलकर। मन कहता है, आज ये मेरा रंग डालूँ तुझे रंगों से अपने बैंगनी, हरे, लाल,नीले, पीले रंगों से सजा दूँ चेहरा तेरा। खेलूँ रंग यूँ साथ मैं तेरे भीगे तू भी संग में मेरे ना पहचाने जाएँ ये
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Tera Zikr Ho..

तेरा ज़िक्र हो, तेरी फ़िक्र हो… तेरा नाम लूँ, तेरी याद हो… एक मेहरबानी यह कर सनम, मैं बीमार-ए-इश्क़ तेरे नाम की… मेरी ख़ैरियत मुझसे पूछ ले, कहीं अफ़सोस ना मेरे बाद हो… मैं खिज़ा सही, मुझे प्यार कर, यूँ तलब ना कर तू बहार की… ऐसे समेट ले मुझे धड़कन मे,
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जहाँ चुक जाते हैं शब्द : राजेन्द्र राजन

शब्दों में शब्द जोड़ते मैं वहाँ आ पहुंचा हूं जहां और शब्द नहीं मिलते मैं क्या करूँ अब मैं कैसे लिखूं समय के पृष्ट पर अपनी सबसे जरूरी कविता शब्दों में शब्द जोड़ते जहां चुक जाते हैं शब्द मैं क्या करूं ? क्या मैं वहीं खुद को जोड़ दूं ? मगर क्या अपने शब्
 
अफ़लातून