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किसके चिल्लाने की बारी है-हिन्दी व्यंग्य कविता

भ्रष्टाचार, अत्याचार और व्याभिचार को भी जाति, भाषा और धर्म के नाम पर बांटने की कोशिश जारी है, अक्लमंद दिखाते हैं बहादुरी अपने अपने हिस्से की शिकायतें उठाने में शब्द खर्च करते दूसरे की कमियां गिनाने में हर हादसे पर देखते हैं बस यही कि किसके चिल्लाने की
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इशारे-हिन्दी व्यंग्य कविता (ishare-hindi satire poem)

तैश में आकर तांडव नृत्य मत करना चक्षु होते हुए भी दृष्टिहीन जीभ होते हुए भी गूंगे कान होते हुए भी बहरे यह लोग इशारे से तुम्हें उकसा रहे रहे हैं। जब तुम खो बैठोगे अपने होश, तब यह वातानुकूलित कमरों में बैठकर तमाशाबीन बन जायेंगे तुम्हें एक पुतले की तरह अपने
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फरिश्ते होने का अहसास जताते-व्यंग्य कविता

किताबों में लिखे शब्द कभी दुनियां नहीं चलाते। इंसानी आदतें चलती अपने जज़्बातों के साथ कभी रोना कभी हंसना कभी उसमें बहना कोई फरिश्ते आकर नहीं बताते। ओ किताब हाथ में थमाकर लोगों को बहलाने वालों! शब्द दुनियां को सजाते हैं पर खुद कुछ नहीं बनाते कभी खुशी और