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नज़र मिलायें तो मिलायें कैसे

बेरुखी का सबब बतायें तो बतायें कैसे, तुमसे नज़र मिलायें तो मिलायें कैसे| कोई शख्स हो तो भुल भी जायें हम, खुदको खुदसे भुलायें तो भुलायें कैसे| तुमसे नज़र मिलायें तो मिलायें कैसे… जिसकी तामीर में उम्र गुज़ार गयी, उस घर को छोडके जायें तो जायें
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बिछड़ा यार नहीं मिलता

खुदा भी शायद नाराज़ है हमसे, मिन्नतों से बिछड़ा यार नहीं मिलता| इसमें कहाँ पहले सी बात रही, अब शराबों से खुमार नहीं मिलता| मिन्नतों से बिछड़ा यार नहीं मिलता… मिलते हैं रिश्ते विरासत में यहाँ, हर रिश्ते में लेकिन प्यार नहीं मिलता|
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दुआ में असर रहे

कभी तो दुआ में असर रहे, कभी तो उसकी हम पर नज़र रहे| मैं तोड़ दूंगा सारी बंदिशें सनम, तुझमें साथ चलने का जिगर रहे| कभी तो दुआ में असर रहे… बेखुदी उलझा ले चाहे जितना, तुम्हे जिंदिगी की तो कदर रहे| कभी तो दुआ में असर रहे… पत्थर
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जवां हो जाने की

अहिस्ता रख ज़ख्मों पर हाथ सनम, इनकी तासीर है जवां हो जाने की| शमा-ए-मोहब्बत ना रहेगी उम्र भर, इसकी किस्मत है धुआं हो जाने की| इनकी तासीर है जवां हो जाने की.. हर वक्त क्या ढूँढता है लोगों में तू, तुझे बिमारी है गुमां हो जाने की| इनकी तासीर
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प्यार के चंद किस्से हैं

प्यार के चंद किस्से हैं, सब मेरे ही हिस्से हैं| एक ही अंजाम सबका, खामोश हम सिसके हैं| प्यार के चंद किस्से हैं… वो समझा नहीं हमें, हुए हम पूरे जिसके हैं| प्यार के चंद किस्से हैं… अब अपना कुछ कहाँ, हम जो हैं सब उसके हैं|
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कहने दो ना जिंदिगी

वहमों में रहने दो ना जिंदिगी, कहने को कहने दो ना जिंदिगी| ग़मों का दरिया या गिलों की बारिश, हमें हर हाल में बहने दो ना जिंदिगी| कहने को कहने दो ना जिंदिगी… सब दिखता है मेरे अलावा मुझको, मुझे कुछ नए आईने दो ना जिंदिगी| कहने को कहने दो
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आसान ना होगा

नाज़ुक दिल में सितमगर रखना आसान ना होगा, उसकी बेरुखी से कब तू वीर परेशान ना होगा| शायद वहम ही हो उसकी मोहब्बत दोस्त मगर, वहम के बगैर भी दिल को आराम ना होगा| नाज़ुक दिल में सितमगर रखना आसान ना होगा… माना मशहूर है किस्सा मेरी वफ़ा का यारों,
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तेरी कांपती उँगलियाँ

मेरे जबीं पर तेरी कांपती उँगलियाँ, जैसे सूखे फूल पर नाचती तितलियाँ| कितना कुछ समाया था सायों में, गूंजती रही देर तलक खामोशियाँ| मेरे जबीं पर तेरी कांपती उँगलियाँ… ख्यालों से बेपनाह मोहब्बत तक, क्या क्या ना था हमारे दरमियाँ| मेरे जबीं
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मेरे नाम का अश्क

दबी हुई मुस्कुराहट से छुपाया तो था, मेरे नाम का अश्क आँखों तक आया तो था| वो बिखरता ही चला गया लम्हा लम्हा, मैंने उसे गले ज़रूर लगाया तो था| मेरे नाम का अश्क आँखों तक आया तो था… शायद वीराना हो जाए वक्त के साथ, हमने आरजू का एक घर बनाया तो
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कातिल बना गयी

मेरी कमज़ोरी मेरा दामन जला गयी, मेरी खुदी मुझे कातिल बना गयी| मेरी मोहब्बत शायद काफी ना थी, मेरी फितरत मुझे नाकाबिल बना गयी| मेरी खुदी मुझे कातिल बना गयी… तुम मेरे नुस्क ना संभाल पाये, मेरी आवारगी मुझे साहिल बना गयी| मेरी खुदी मुझे
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तेरा हिस्सा कोई

मेरे ज़हन से लिपटा तेरा हिस्सा कोई, लफ़्ज़ों की तलाश में भटकता किस्सा कोई| जब नोचती है दुनिया मेरे सहमे दिल को, मुझे सीने से लगा लेता है तेरा हिस्सा कोई| ज़ुल्म ए फ़िराक से कब टूटा है ‘वीर’, जोड़ देता है फिर खुदसे तेरा हिस्सा कोई|
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मैं बिखर जाता हूँ

तेरी खुशी में ही अपनी खुशी पाता हूँ, तुम सिमट जाओ मैं बिखर जाता हूँ| मिलूँ तुम्हे हर शय के कतरे में, यूँ तेरी खुदी में बरस जाता हूँ| तुम सिमट जाओ मैं बिखर जाता हूँ… है नहीं उम्र देने को पास मेरे, हाँ कुछ लम्हें ज़रूर चुरा लाता हूँ|
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कहीं खो जाऊँगा

पल में अक्स सा ओझल हो जाऊँगा, अनजाने ख्वाब सा कहीं खो जाऊँगा| खलिश भी ना होगी जुदाई की कोई, तुम्हारे ज़हन में ऐसा बस जाऊँगा| अनजाने ख्वाब सा कहीं खो जाऊँगा… हाथों की लकीरों को जब देखोगे कभी, इनमे कहीं तुम्हे मैं नज़र आऊँगा| अनजाने
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हासिल के दायरे

तेरे नाम को हम कब रोते हैं, हासिल के दायरे बहुत छोटे हैं| ना रख कोई खलिश दिल में, ख्वाब आखिर ख्वाब ही होते हैं| हासिल के दायरे बहुत छोटे हैं… यही तो दस्तूर है ज़माने का, मिलकर दिल अक्सर जुदा होते हैं| हासिल के दायरे बहुत छोटे
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प्यासा रहता है

कोई सहरा में बूँद ढूँढता है, कहीं सागर भी प्यासा रहता है| कहीं चार लम्हें जिंदिगी बन जाते हैं, कहीं कोई बरसों पल पल मरता है| कहीं सागर भी प्यासा रहता है… कभी अश्क पी लेता है छलकने से पहले, कभी खामोश तन्हा सिसकता रहता है| कहीं सागर भी
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रोने दो मुझे

अपने दामन में खोने दो मुझे, आज लिपट कर रोने दो मुझे| बड़ी मुद्दत से पथराई हैं आंखें, आज देर तलक सोने दो मुझे| आज लिपट कर रोने दो मुझे… भागते भागते बिछड़ा खुदसे, फिर मुझसा होने दो मुझे| आज लिपट कर रोने दो मुझे… दिल अपनों के दागों
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शब्दों का मदारी

शब्दों का मदारी समझते हो, ख़ामोशी को वफादारी समझते हो| रिश्तों में कोई प्यार नहीं है, इन्हें बस जवाबदारी समझते हो| शब्दों का मदारी समझते हो… हाँ सोचता हूँ हर पल तुम्हे, इसे मेरी बेरोज़गारी समझते हो| शब्दों का मदारी समझते हो… बस
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नादां

ऐसे नादां की हर ठोकर पर गिरते हैं, फिर भी हम दाना बने फिरते हैं| कौन मरता है किसी के साथ यहाँ, कैसे हमदम जाना बने फिरते हैं| फिर भी हम दाना बने फिरते हैं… कहने को एक घर है पास लेकिन, कितने साये वीराना बने फिरते हैं| फिर भी हम दाना
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ज़ख्म

माज़ी के दाग यादों से जाते क्यों नहीं, मैं तो भुल चला, ये ज़क्म मुझे भुलाते क्यों नहीं| झटक दूं इन्हें ज़हन से तो साँस मिले, मार तो दिया है मुझे, ज़ालिम दफनाते क्यों नहीं| ना अश्क से सींचा, ना ख्यालों की ज़मीन दी, फिर भी दर्द के ये फूल, मुरझाते
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तारीफ़ ए ग़ज़ल

लफ़्ज़ों के नक़ाब से गम छुपा लिया करते हैं, तारीफ़ ए ग़ज़ल पर हम मुस्कुरा लिया करते हैं| जब ख़ामोशी खटखटाती है तन्हाई का दरवाज़ा, अपनी ग़ज़लों को हम गुनगुना लिया करते हैं| तारीफ़ ए ग़ज़ल पर हम मुस्कुरा लिया करते हैं… कभी दिल मचल के कहने लगता है हाल
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भूल कर बैठा हूँ

कुछ पल जीने की भूल कर बैठा हूँ, अपने ज़ख्म सी ने भूल कर बैठा हूँ| प्यासा रहना किस्मत है और फितरत भी, तेरी आँखों से पीने की भूल कर बैठा हूँ| अपने ज़ख्म सी ने भूल कर बैठा हूँ… यूँ तो आई थी मेरी राह में मोहब्बत कभी, मैं ही इसे खोने की भूल कर
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आदत हो गयी है

इंतज़ार की घडी इबादत हो गयी है, ए दिल तुझे उसकी आदत हो गयी है| कुछ सोच ले अपने बारे में भी, खुदसे खुदकी मीठी बगावत हो गयी है| ए दिल तुझे उसकी आदत हो गयी है… उसके नाम से पुकार ना लूं रकीब को, इश्क में बड़ी हिमाकत हो गयी है| ए दिल तुझे
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आवारा है वो

उथले समुन्दर का फेला किनारा है वो, शायद मुझ जैसा ही आवारा है वो| वो सही बेवफा ज़माने की नज़र में, हर हाल में मुझे गवारा है वो| उसे नहीं आरजू किसी से कोई, तन्हा अपना खुद सहारा है वो| Filed under: कविताएँ, हिन्दी कविता, ग़ज़ल, Ghazals, Hindi
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गम हमारे खुशी अपनी

क्यों लिखते हैं बेखुदी अपनी, हैं गम हमारे खुशी अपनी| आईने से नाराज़ हैं हम, है खुदसे बेरुखी अपनी| कोई पूछे मंजिल तो क्या कहें, आवारा कर गयी बेसुधी अपनी| कौन हैं हालात का जवाबदार, हैं हम और है बेबसी अपनी| मिलो सबसे मुस्कुरा कर
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चल यूँ कर लें

दिखाई दे हर शय में तुझे, उसे ऐसे आँखों में भर लें| महकता रहे ज़हन हमेशा, उसे ऐसे सांसों में भर लें| कुछ ना रहे माज़ी का बाकी, उसे ऐसे यादों में भर लें| सिर्फ एक लकीर हो किस्मत की, उसे ऐसे हाथों में भर लें| हर लफ्ज़ में घुल जाए ज़िक्र, उसे
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रुखा सा लम्हा

रुखा सा लम्हा ले कर उसे, हम नम बना लिया करते हैं| तेरे बिना वक्त की सदियाँ, हम यूँ गुज़ार लिया करते हैं| याद जब खलिश सी लगती है, नाम तेरा पुकार लिया करते हैं| Filed under: कविताएँ, हिन्दी कविता, ग़ज़ल, Ghazals, Hindi Poetry, Poem, Shayari,
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सहम जाता है

उसूल दरवाज़ा खटखटाते हैं तो जज़्बात सहम जाता है, दिल बच्चा सा है हमारा थोड़ी आहट से सहम जाता है| सही और गलत के दायरों में ढलते ढलते, मासूम एक नन्हा सा दिल मचल जाता है| झूट और सच का आईना बड़ा कमज़ोर होता है, हसरत के एक छोटे से पत्थर से ये चटक जाता
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नाराज़ तुमसे

कह दूं ये राज़ तुमसे, के मैं हूँ नाराज़ तुमसे| झूमते हो मेरे लफ़्ज़ों पर, छीन लूं ये साज़ तुमसे| के मैं हूँ नाराज़ तुमसे… ये कुर्बत है और फासला भी, जोड़ते हैं मुझे अलफ़ाज़ तुमसे| के मैं हूँ नाराज़ तुमसे… बेखुदी में फ़ना होगा
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आदमी

है कोई पुरजे सा आदमी, है ना! घूमता हर लम्हा आदमी, है ना! थक के रुकना उसको गवारा नहीं, बड़ता हर लम्हा आदमी, है ना! अपनी तलाश से वो मायूस नहीं, ढूँढता हर लम्हा आदमी, है ना! अपनी खुदी का सुरूर है उसको, झूमता है लम्हा आदमी, है ना! Filed under: कविताएँ, हिन्दी
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हिसाब

आओ हिसाब साफ़ कर लें, खुदको खुदसे पास कर लें| सच बोलना महंगा था ना सनम, एक दुसरे के झूठ माफ कर लें| नज़र आयें वैसे जैसे हैं हम दोनों, ईमान अपना मिलकर पाक कर लें| मैं बसा लूं आपको सीने में, आप गिराके ज़ुल्फ़ को रात कर लें| क्यों रहें हम
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दोस्तों

कहना है तो आवारा मुझे कहो दोस्तों, आओ मेरे साथ थोडा और बहो दोस्तों| दोस्ती की है तो संभालो गिरते हुए, बस देखते ना मुझे रहो दोस्तों| मेरी फितरत तुम्हे ना लग जाए कहीं, तुम भी ना लम्हा लम्हा मरो दोस्तों| है इसकी अदा हमें तड़पाने की, हौले हौले
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बात निकली

कहते कहते बात निकली, करहा के हमसे आह निकली| बंद ताले जब खोले हमने, गुजरी हुई हर साँस निकली| देखते देखते सहर हो गयी, आँखों आँखों में रात निकली| बंदगी की बाज़ी जीत तो गया, इसमें खुदी की मात निकली| कहाँ है तू मेरी हमनफस, कहने को तो तू
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ना जी पाओगे

ख्यालों से मुझे ना समझ पाओगे, लफ़्ज़ों से मुझे ना पकड़ पाओगे| मेरे दर्द का एहसास तो होगा तुम्हे, मेरी नम आँखों का ना देख पाओगे| मुझे कतरा कतरा बाँट तो लोगे तुम, इन कतरों से मुझे ना जोड़ पाओगे| सुन भी लोगे सदा अगर चाहो तो, मगर मेरी आह को ना सुन
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ख्वाब तुम्हारा तोड़ दूं

लाओ मैं ही ख्वाब तुम्हारा तोड़ दूं, बेवफा होकर दिल तुम्हारा तोड़ दूं| अपने ही तो जलाते हैं जिस्म चिता में, मैं ख्याल बनकर ज़हन तुम्हारा छोड़ दूं| फिर तुम्हे मिले ना मिले कोई रहनुमा, आज मैं ही रास्ता तुम्हारा मोड़ दूं| Filed under: कविताएँ,
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सादगी गुमा दी

सादगी गुमा दी माँ मैंने, जिंदिगी उलझा ली माँ मैंने| मिली ना सुकून की बूंद तो, आंख अपनी भिगा ली माँ मैंने| तू कहती थी होसला रख हमेशा, देख उम्मीद की लौ बुझा दी माँ मैंने| बनाता था कभी कागज से कश्तियाँ, देख सारी कश्तियाँ डूबा दी माँ
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पछतायेगा

मुझको खुदा मत बना पछतायेगा! मैं बंदगी नहीं इखलास का प्यासा हूँ, मुझको इबादत मत बना पछतायेगा| है मुझ में दर्द कई, मैं भी नाराज़ हूँ खुदसे, मुझको फरिश्ता मत बना पछतायेगा| मैं हासिल से दूर ही भला, खाली हाथ जाऊँगा| मुझको सिकंदर मत बना
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देखा ना सोचा ना

देखा ना सोचा ना! बस कर दिया हवाले| कौन कब तलक शीशा संभाले| रखा ना अपना भरोसा बंद ताले में, जो चाहे मेरी ज़मीन उड़ा ले| है तेरे नज़र खुदी मेरी, तू चाहे गिराए तो चाहे उठाले| है मोहब्बत चारो और फेली, तू जहाँ चाहे अपना घर बना ले| तिनके
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मुझे और खोकला कर गए ना तुम

मेरे ख्यालों से भर गए ना तुम, मुझे और खोकला कर गए ना तुम| इतना सहम गए शीशे से क्यों, अपने अक्स से ही डर गए ना तुम| मुझे और खोकला कर गए ना तुम… मुझे दे कर जिंदिगी सज़ा में, खुद लम्हा लम्हा मर गए ना तुम| मुझे और खोकला कर गए ना
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शिकवा जिंदिगी से

अब ना कोई शिकवा है जिंदिगी से, ज़हर पी लिया हमने अपनी खुशी से| भटकते ख्यालों का जशन ना हो खत्म, कुछ सिलसिले बना रखे हैं सभी से| अब ना कोई शिकवा है जिंदिगी से… ढूँढता है वो मुझे गलियों गलियों, जब हम मिट चुके हैं कभी के| अब ना कोई
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मौत का इंतज़ार

घिस घिस के हाथ लहू हुआ, लकीरें मिट जाती क्यों नहीं| सांसों ने बांधा है मुझे इनसे, एक बार रूठ के जाती क्यों नहीं| रूठी जिंदिगी को मनाया हमने बहुत, कभी ये हमें मनाती क्यों नहीं| है खंजर तेरा मेरे गले पे, हलक मुझे क्यों कर डालती