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शामरंगी रंगली ती शुद्ध हे किटाळ आहे

शामरंगी रंगली ती शुद्ध हे किटाळ आहेगौळणिंनो, रंग राधेचा किती दुधाळ आहेचेहर्‍यावर ओढणीचा ठेवते खडा पहाराहाय! अधरामृत तिचे अद्याप वस्त्रगाळ आहेपारिजाताच्या सड्याची नर्तनास दाद गेली(त्यास पायी तुडवणार्‍या पावलात चाळ आहे)गंध अर्धोन्मीलितेचा वेड लावतो
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त्रिवेणी संगम

जालोर में मेरे दो साहित्यिक मित्र हैं. एक अचलेश्वर "आनंद" दूसरे परमानंद भट्ट. एक "आनंद" तो दूसरा "परमानंद" ! अब समझे आप मेरे सदा आनंदित रहने का रहस्य ? हम तीनों ग़ज़लों के रसिया. ग़ज़ल कहना, पढ़ना, सुनना और सुनाना हम तीनों को बहुत अच्छा लगता है. और एक रहस्य
 
jogeshwar garg
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बबलगम -ग़ज़ल

दुनिया का दरबार बबलगमजैसे खिंचता तार बबलगम मसले ये चलते रहते हैं इश्क मुहब्बत प्यार बबलगम तुमने जब तनहा कर छोड़ा बस था मेरा यार बबलगम चिपकाया अच्छाई के सर दुनिया ने हर बार बबलगम पल दो पल का मीठापन है रिश्ते , रिश्तेदार बबलगम चिपक गया है होंठ पे आ कर नाम
 
स्वप्निल कुमार 'आतिश'
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खुशिओं का रेसेशन

समझाती हो जब तुम , दादी लगती होलोक कथाओं सी तुम सादी लगती होखुशिओं के इस रेसेशन में तुम जानाँ हीरा मोती सोना चांदी लगती होपरियों के पर फूल बने खिलते हों जहांतुम वो जादू वाली वादी लगती होमैंने तुमसे धनक बरसते देखा हैरंग हो तुम पर कितनी सादी लगती होआँच.!
 
स्वप्निल कुमार 'आतिश'
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सिर्फ कन्हैया सिर्फ कन्हैया

सामान्यतया एक ही ग़ज़ल के विभिन्न अशआर अपनेआप में स्वतंत्र इकाई होते हैं. रदीफ़/काफिया के बंधन की बात छोड़ दें तो कथ्य की दृष्टि से हर शेर एक स्वतंत्र एवं परिपूर्ण कविता होती है. रदीफ़, काफिया और बहर उन स्वतंत्र इकाइयों को एक बड़ी इकाई का स्वरुप प्रदान करते
 
jogeshwar garg
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जो कभी की नहीं खता मैंने

जो कभी की नहीं खता मैंने खूब पायी वही सज़ा मैंने आपने सुन लिया वही सब कुछ जो कभी भी नहीं कहा मैंने क्या शिकायत करुँ ज़माने की आप भी हैं खफा सुना मैंने आप भी तो कभी सुनें मेरी आप को उम्र भर सुना मैंने आ गया मैं तभी निशाने पर आप को ज़िंदगी कहा मैंने आपको देख
 
jogeshwar garg
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जैसे ख्वाब दिखाए तूने

जैसे ख्वाब दिखाए तूने वैसी अब ताबीरें दे मेरी आँखों में बस जाए ऐसी कुछ तस्वीरें दे और मुझे कुछ दे या ना दे मौला तेरी मर्जी है दानिशमंदी की दौलत दे हिम्मत की जागीरें दे राम भरोसे मुल्क हमारा जो होगा अच्छा होगा नेता से उम्मीद यही बस अच्छी सी तक़रीरें दे जब
 
jogeshwar garg
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फूल मत तू

फूल मत तू सफलता की हाथ चाबी देख कर लोग तो जलते रहेंगे कामयाबी देख कर आपकी परछाइयों का है असर मत चोंकिये रंग मेरी शक्ल का इतना गुलाबी देख कर वो लगे अहसान गिनने तो हंसी आयी मुझे ज़ख्म गिनने में उन्हीं की बेहिसाबी देख कर नाम कितने हैं बड़े फैशन मनोरंजन
 
jogeshwar garg
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ज़रा एडी उठा के सैंडलों की हील तो देखो

चढ़ा फिर से कोई सूली, ज़रा ये कील तो देखोफलक पे हो रही है खुश बहुत वो चील तो देखो बना कर बुत तुझे पूजा यही तालीम थी इसकी कमाँ पर तीर को ताने हुए ये भील* तो देखो ये टुकड़े हैं , बरसना इनको मुद्दत से नहीं आयाअगर हो जाएं इक दूजे में ये तहलील* तो देखो ये
 
स्वप्निल कुमार 'आतिश'
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मुख़ातिब बस ग़मे-दिल हो तो ऐसा हो भी सकता है (ग़ज़ल)

मुख़ातिब बस ग़मे-दिल हो तो ऐसा हो भी सकता है अकेला शख़्स महफ़िल हो तो ऐसा हो भी सकता है कभी पानी से लगती आग देखी है सनम तुमने तेरे आँसू मेरा दिल हो तो ऐसा हो भी सकता है सफ़र तय हो नहीं सकता झपकते ही पलक लेकिन अगर बेताब मंज़िल हो तो ऐसा हो भी सकता है
 
madhur
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मिले मज़बूत को मज़बूतियाँ हर पल सहारे भी

मिले मज़बूत को मज़बूतियाँ हर पल सहारे भी उन्हें हासिल हमेशा ही निगाहें भी नज़ारे भी किसे दें दोष गर ये ज़िंदगी सैलाब बन जाए कभी मदहोश धाराएं कभी बेखुद किनारे भी न जाने ज़िंदगी क्या क्या दिखायेगी अभी आगे कभी कुहरा कभी पतझड़ कभी
 
jogeshwar garg
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रिश्तों का रंग नीला हैं

राग मल्हार सा गीला हैंआवाजों का टीला हैं किसने पानी की परतों कोनाखूनों से छीला हैं आसमान-से दूर हुएरिश्तों का रंग नीला हैं चाँद पे कई जम जाएगीकुछ रातों से सीला हैं गाँव का कुआं कहता है शहर का पानी पीला हैं दस्तक तो धीमी दी थीदरवाज़ा ही ढीला हैंआंच सुनहरे
 
स्वप्निल कुमार 'आतिश'
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ये पुरानी बात है

सब सही था ये पुरानी बात है आज बेकाबू बहुत हालात है ज़िंदगी आघात-दर-आघात है एक पल शह दूसरे पल मात है जातियां तो जिस्म की मज़बूरियाँ रूह की ना पांत है न जात है क्या अमावस पूर्णिमा को खा गयी क्यों भला इतनी अंधेरी रात हैहर कदम पर है सितारों का
 
jogeshwar garg
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मुझको तेरी गोदी धानी लगती है

ये जोड़ी इक राजा रानी लगती हैसीधी सादी एक कहानी लगती हैदिल भी कितनी बार सुने, झेले इसकोधड़कन की हर बात पुरानी लगती हैजंगल, वादी, सहरा दरिया ..सब सहरामुझको तेरी गोदी धानी लगती हैआवाजों के जमघट में सन्नाटा हैकुछ तो इसने मन में ठानी लगती हैमुझे खबर है, खुदा
 
स्वप्निल कुमार 'आतिश'
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तेरे वादों के चूहों ने, मेरी हर शाम कुतरी है..

ग़ज़ल की ये जो गठरी हैबड़ी शीरीन मिसरी है मेरे खाबों में मिमियाती,तेरी हर याद बकरी है..ज़रा सी धूल माज़ी कीतेरे लट्टू से बिखरी है तेरे वादों के चूहों ने,मेरी हर शाम कुतरी है..बरस तू ही बचा तू हीन बादल है न छतरी हैतेरी हर आंच "आतिश" केदिए की लौ में उतरी है
 
स्वप्निल कुमार 'आतिश'
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मरण

काही झिजून मेले, काही मढून मेलेबहुसंख्य मात्र येथे केवळ जगून मेलेदे, कायद्या, पुरावा काही जिवंततेचाचिखलात तारखांच्या लाखो रुतून मेलेरात्री ऋतू-ऋतूने बर्फाळ होत गेल्याज्योती, पतंग दोघे मग गारठून मेलेकौतुक करा फुलाच्या ह्या एकनिष्ठतेचेजे एकदाच फुलले अन्‌
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कहीं आतिश के जुर्मों की नहीं होती है सुनवाई

मेरे छत की तलहटी में जमी है धूप की काईजहां पर दोपहर से बात करती है ये तन्हाईये मुझसे बात करती हैं तेरी बाँहों के बारे मेंहवाएं रोज़ कहती हैं कि तुझसे है शनासाईवो दिन बचपन के अच्छे थे कि जब हम तुमसे मिलते थेन था बदनामियों का डर , न ही थी उसमे रुसवाईमेरी
 
स्वप्निल कुमार 'आतिश'
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फ़लक पर एक भी उल्का नहीं है

अदा है, नाज़ है, नखरा नहीं हैमेरी जानां है वो फितना नहीं हैकिसी जिद पे अड़े बच्चे के माफिकये सन्नाटा मेरी सुनता नहीं हैगली ही भौंकती है आज मुझ परयहाँ तो एक भी कुत्ता नहीं हैखुनक सी, नर्म सी, पुरनूर बातेंये तेरी बात का लहजा नहीं है वो रूठी है समन्दर से कुछ
 
स्वप्निल कुमार 'आतिश'
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शोध

थकल्यावरती सहज शिराया कूस शोधतो आहेएकाकी चालुन थकलो, जूलूस शोधतो आहेगर्दी भाडोत्री मिळते, जयघोष टेप केलेलासुखसोयींनी युक्त असा मी क्रूस शोधतो आहेआयुष्याच्या प्रखर उन्हाने रोज काहिली होतेआभासी का होईना, पाऊस शोधतो आहेप्रेयस, श्रेयस, राजस, तामस -  रूप
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कहूं शाम इसको कहूं या सवेरा

कहूं शाम इसको कहूं या सवेरा कभी है उजाला कभी फिर अन्धेरा कभी है खुशी तो कभी गम घनेरा अरे क्या हुआ क्या हुआ हाल मेरा मुझे पूछते सब बता ए मुसाफिर किधर है ठिकाना कहाँ है बसेरा मुझे मार कर कह दिया है शहादत मेरी राख को फिर
 
jogeshwar garg
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उगा का स्वत:ला सजवले असावे ?

उगा का स्वत:ला सजवले असावे ? तिला प्रेम माझे उमजले असावे असे गंध हा कस्तुरी भावनांचा उराशी तिने पत्र धरले असावे अचानक नकारातला जोर सरला कुणी नाव माझे सुचवले असावे सहज गाजवू लागली हक्क तेव्हा मनाने तुला खास वरले असावेकधी ती
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जो बन्दा बिंदास रे जोगी

जो बन्दा बिंदास रे जोगी दुनिया उसकी दास रे जोगी इतना ध्यान हमेशा रखना कौन बना क्यों ख़ास रे जोगी ज्ञान-समंदर उतना गहरा जितनी जिसकी प्यास रे जोगी भौंचक अवध समझ नहीं पाया कौन गया वनवास रे जोगी दुनियादारी ढोते
 
jogeshwar garg
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इस माथे पर बाम लगा दो

आसमान पर शाम लगा दोइस माथे पर बाम लगा दोचार ही दीवारें हैं घर मेंआ कर चारो धाम लगा दोआईने के बाजारों मेंमेरे अक्स का दाम लगा दोचाँद भाग रहा है तेज़ी सेतुम रस्ते में जाम लगा दोआतिश इक सूना साहिल हैआंच..!यहाँ इक पाम लगा दो
 
स्वप्निल कुमार 'आतिश'
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शो-रूम

जातो तिथे कपाटे उघडून पाहतो मीग्रंथांविना घराला शो-रूम मानतो मीवाटेत माणसाचे माणूसपण हरवलेउत्क्रांतवाद कोठे चुकला, तपासतो मीबांधून ठेवणारे विरलेत सर्व धागेतुटलेपणा मनांचा शब्दात ओवतो मीशिकलो नव्या जगाचे रीती-रिवाज मीहीसोयीनुसार जवळी येतो, दुरावतो
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किसी को बना दे किसी को मिटा दे

किसी को बना दे किसी को मिटा दे खुदा है कि क्या है मुझे तू बता दे अगर है मुहब्बत किसी दिन जता दे कभी देख मुझको ज़रा मुस्कुरा दे  मिटा दो रिवाजों को रस्मों को यारों मुहब्बत करे और फिर भी दगा दे  दिला दे हमें याद फिर वो
 
jogeshwar garg
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रौशनी कर

रौशनी कर घर जला कर बोल हंस कर ग़म भुला कर जीतते ही मैं सिकंदर  हार मेरी शहर के सर  बूँद हूँ मैं तू समंदर  छोड़ कल की आज ही कर उम्र गुजरी राह चल करदोस्त सब खुश ज़ख्म दे कर  शिव बने शिव ज़हर पी
 
jogeshwar garg
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इसलिए उनका नाम बहुत है

सर पे उनका इलज़ाम बहुत है ।इसलिए उनका नाम बहुत है  ॥ जाते हैं वो विदेश मुफ्त में ।देश में उनका दाम बहुत है ॥ अगला चुनाव से पहले बिजली ।गाँव गाँव में काम बहुत है ॥ करनी है ना शायरी अबके ।शायरी में ताम झाम बहुत है ॥ अब जागो बहुत कठिन डगर है ।कर लिया
 
Indranil Bhattacharjee ........."सैल"
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ये नासाज़* लीवर यहाँ रह गया

ज़माना कहाँ वो कहाँ रह गया वो माज़ी में अपने निहां* रह गया उजाले ने धोखा दिया इस तरहसलाखों में घुटकर धुआँ रह गया अमूमन मोहब्बत है दिल की अदू* ये नासाज़* लीवर यहाँ रह गया (dedicated to my jaundice :P :D }मुहब्बत के शम्मों पे नब्जें रुकीं दिलों में धड़कता
 
स्वप्निल कुमार 'आतिश'
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ये फोटो झक्कास लगी है

ek halki fulki si ghazal..pichli wali utha ke thak gaya to..ye halki si is dafa.... :)जब से तुम को प्यास लगी हैदरियाओं को आस लगी हैशर्माने वाली हर इक शयमुझको तो बिंदास लगी हैमैं ,तुम, चंदा चल के बैठेंमेरे लान में घास लगी है तेरे पांवों की हर ख़ुशबूइन
 
स्वप्निल कुमार 'आतिश'
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वो मुस्कुरा के अपने कस्टमर से मिलता था

वो अपनी सेहत का अच्छे से ध्यान रखता था वो गाँव में भी अपना इक मकान रखता था वो मुस्कुरा के अपने कस्टमर से मिलता था वो दिल के ओट में अपनी दुकान रखता था बहुत बेफिक्र सा बादल था वो बरसता था वो अपना एक अलग आसमान रखता था वो मिलता था तो बहुत फासले से मिलता था
 
स्वप्निल कुमार 'आतिश'
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कमरे में कितने मच्छर.. कहाँ आदमी तन्हा है

एक काफी पुरानी ग़ज़ल मिल गयी किसी प्रतियोगिता के में भेजी थी ..आप लोगों से बाँट रहा हूँ ..ये सहरे का सपना हैदेखो कितना गीला हैमुझसे मिलता-जुलता हैसन्नाटे का चेहरा हैनन्ही आँख की डिबिया मेंख्वाब हींग सा महक़ा हैअपने घर के कोने मेंगीली आँखें रखता हैमुझको
 
स्वप्निल कुमार 'आतिश'
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आदमी क्या था कह लो हादसा था

पिछले साल तक मैं आप सा थाआदमी क्या था कह लो हादसा थाशाम को पेंच ढीला ही पड़ा थाफ़लक को रात में किसने कसा था ?पिछली बारिश का रंग गहरा था बादल, जैसे बिलकुल फालसा* थाचाँद चेहरा है कौडियालों* कामुझे कल रात ही इसने डंसा था आंच सूरज में तेरे रौशनी थी आतिश एक
 
स्वप्निल कुमार 'आतिश'
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कागज की कश्ती

चलिए हंसी मजाक हो गया, अब फिर से संजीदा कुछ हो जाये - कर लो चाहे कुछ भी पर ये यार नहीं कर पाओगे ।कागज की कश्ती से सागर पार नहीं कर पाओगे ॥पी कर आंसुओं को मैंने, छाती पर पत्थर रखकर ।किया है जिस तरह इंतज़ार नहीं कर पाओगे ॥लेकर नाम उनका तुमने पुकारा है
 
Indranil Bhattacharjee ........."सैल"
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सब मुझको समझायेंगे

सब मुझको समझायेंगे फिर तुमको बहलाएँगे  उलझी खूब पहेली है कौन इसे सुलझाएंगे  होली पर भी कुछ पागल दीवाली के गायेंगे  समझेगा भी कौन यहाँ किस किस को समझायेंगे  जीती बाज़ी हारेंगे अहम् जहां टकरायेंगे  पढ़े नहीं
 
jogeshwar garg
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अपने घर को हार कर वो इक मकान जीत गयी

तीर का जो साथ था तो वो कमान जीत गयीहार गया मैं ज़मीं वो आसमान जीत गयीदिल को अपने चुप करा दिमाग की सुनी मगरअपने घर को हार कर वो इक मकान जीत गयीबांसुरी के साथ मिल के उसने मुझे ठग लियाहार गए सारे सुर वो मेरा गान जीत गयी मुन्सिफों ने केस को सुना तो फैसला
 
स्वप्निल कुमार 'आतिश'
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ये ब्लॉग जगत है

कुछ स्वाद बदलने के लिए और कुछ इस ब्लॉग जगत के बारे में कहने के लिए लीजिये ये रचना प्रस्तुत है; उम्मीद है ठेठ ब्लॉगर भाई लोग बुरा नहीं मानेंगे:किसने कहा जो लिखी है मैंने वो ग़ज़ल है ।चलता है सबकुछ नया फैशन आजकल है ॥मैं भी लिखूं, तुम भी लिखो, कथा-हास्य-काव्य
 
Indranil Bhattacharjee ........."सैल"
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जल प्रदूषित और ज़हरीली हवाएं देखिये

जल प्रदूषित और ज़हरीली हवाएं देखिये और फिर उनके बयानों की अदाएं देखिये  मूक दर्शक बन खडा है आदमी जो आम है शोक की या शौक़ की सारी सभाएं देखिये  वस्त्र की जो ओट है तन पर उसे भी चीर कर  भेड़िये सी ताकती भूखी निगाहें
 
jogeshwar garg
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सीधी बात है कहने दो !

सीधी बात है कहने दो !जो जैसा है रहने दो !!ज़ब्त हम में है बहुत !हर सितम को सहने दो !!बेरहम जज़्बात के !अब शहर को ढहने दो !!हाथ-पैर जकड़े हुए !कुछ जुबां से कहने दो !!मोहलत से आये बड़ी !अश्कों को अब बहने दो !!दिल में मुहब्बत नहीं !‘सैल’ तकल्लुफ रहने दो !!
 
Indranil Bhattacharjee ........."सैल"
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दुबली, पतली, पीली रात

सिमटी सी शर्मीली रातभोली छैल छबीली रात काई काई चाँद हुआजब भी आई गीली रात चाँद किनारे खड़ा रहाजब जी आया बह ली रात चाँद सितारों की गिरहें हैंफिर भी है कुछ ढीली रात साया जब खोया मेरा तबपैराहन मे सी ली रात यादों की परतें बिखरी हैंमैने कितनी छीली रात आधा ही
 
स्वप्निल कुमार 'आतिश'
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काम रखो बस काम से

मेरे इस ग़ज़ल पर डॉ. डंडा लखनवी जी कुछ सुधार किये हैं ! इसके लिए मैं उनका आभारी हूँ ! उनके द्वारा बताये हुए संसोधन को मैं इसमें शामिल कर रहा हूँ ... मुझे यकीन है कि इससे इस ग़ज़ल में और निखार आ गया है .... सभी बड़ों एवं बुजुर्गों से निवेदन है कि जब भी मौका
 
Indranil Bhattacharjee ........."सैल"
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