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चलो श्मशान पर एक मचान बनायें

तो जीवन क्या ये श्मशान नहीं जलती चिता की पहचान नहीं ये जी जीवन सुलगता है और सुख दुख की आग होती है
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हम भी जियेंगे कभी खाक से निकलकर

बना उन्ही पत्थरों को निशाना हम फिर से गिर गिर जायेंगे हर हार के सीने से लिपट गल्तियाँ फिर वहीं दोहरायेंगे
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RAKESH JAJVALYA राकेश जाज्वल्य

सहमे - सहमे ना करो बात, जरा खुल के कहो। दिन क्यूँ लगने लगी है रात, जरा खुल के कहो। अभी डोर इन रिश्तों के टूटे भी नहीं हैं, अभी दामन इन हाथों से छूटे भी नहीं हैं, अभी आंधी इन राहों में आई भी नहीं है, अभी घोर बदलियाँ भी छाई ही नहीं है, अभी काबू में हैं
 
RAKESH JAJVALYA राकेश जाज्वल्य
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अशोक जमनानी का गीत: ओ पथिक तू चल अकेला

Shareओ पथिक तू चल अकेला कारवां बन जायेगातू समर पर हो समर्पित; तो अमर हो जायेगाना आंसुओं का अर्ध्य  हो न पीर की परवाह होयश की कोई कामना न पथ में शीतल छांव होतू नींव के पत्थर को अपनी आस्था का दान देनिर्माण का हर कंगूरा तुझसे ही जीवन पायेगायह
 
अशोक जमनानी
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मैं ज़िन्दगी का साथ निभाता चला गया

मैं ज़िन्दगी का साथ निभाता चला गयाहर फिकर को धुएँ में उड़ाता चला गया बरबादियों का शोक मानना फिजूल थाबरबादियों का जश्न मनाता चला गयाहर फिकर को धुएँ में उड़ा… जो मिल गया उसी को मुक़द्दर समझ लियाजो खो गया में उसको भूलता चला गयाहर फिकर को धुएँ में उड़ा… ग़म और
 
संजय भास्कर
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रूह का सफ़र

कोई आहट नहीं बदन में कहीं रूह चलती है किस तरह बोलो ,ये बदन थक के चूर है फिर क्यूँ ये रुका है उसी जगह बोलो ?गाँठ सी है पड़ी इन धड़कनों में रूह को रास्ते में रोका है ,सांस की आहटें तो हैं लेकिन सांस का ये सफ़र तो धोका है ..रूह कैसे बढे सफ़र पर अब किस तरह अब
 
स्वप्निल कुमार 'आतिश'
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जब भी कोई खाब निगाहो को सुनाई देगा

जब भी कोई खाब निगाहो को सुनाई देगाआँख को क़ैद और अश्कों को रिहाई देगा हम तो पहले भी मिले हैं मगर खलाओं मेजहाँ हवा भी नही है कहीं फिजाओं मेइस जहां मे जो हम मिले तो कुछ ऐसा होगाअसर थोडा ही......हवाओं पे दिखाई देगा.... जब भी कोई............................
 
स्वप्निल कुमार 'आतिश'
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खेलूं मैं होरी

कृष्ण होली खेलने के लिए गलियों में निकलते हैं उन्हें देखते ही सारी गोपियाँ छुप जाती हैं लेकिन तभी एक कमसिन गोपी उनके हाँथ आ जाती है और वो उसी से होली खेलने लगते हैं. तो वह गोपी क्या कहती है… बारी उमरिया है मोरी ओ कान्हा मोसें खेलो न होली रंग नहीं
 
satyanshu
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भावनाएँ बर्फ़ बन गईं

मानव की भावनाएँ आज बर्फ़ बन गईं ज़िन्दगी की हर खुशी बस दर्द बन गईं। मीठा जहर पिला रहा मानव को मानव आज, प्रतिशोध की आग में सब जर्द बन गईं । इन्सानियत को ढूँढ़ते सदियाँ गुजर गईं, इंसा को इंसा डस रहा बस सर्प बन गईं । हर खुशी का लम्हा है दहशत भरा हुआ ज़िन्दगी की
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