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दादा जी! जरा अपने पोते पोतियों के दोस्त तो बनें!

श्री विष्णु बैरागी जी के ब्लाग एकोऽहम् पर कुछ दिन पहले एक पोस्ट थी  'वृद्धाश्रम: मकान या मानसिकता। मैं ने इस पर टिप्पणी की थी "काका साहब बेटे बहू और पोते पोती के दोस्त क्यों नहीं बन जाते हैं? क्यों दादा ही बने रहना चाहते हैं? मेरे पिता जी के काका जी
 
दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi
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और वो चला गया,बिना मुड़े....(लघु उपन्यास )--6

अपने कमरे में पढ़ाई में मन लगाने की कोशिश कर रही थी.इतना डर लग रहा था,बिलकुल भी नहीं पढ़ पा रही थी और ऐसे में में जब बुआ बड़े शौक से गहनों की डिजाइन पसंद कराने उसके कमरे में आईं तो सुलग उठी वह।‘देख तो नेहा, कौन-कौन सी पसंद है तुझे?‘‘मेरी पसंद का क्या
 
rashmi ravija
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दोस्त और बचपन की यादें = Pradeep Manoria

दोस्त तेरी याद बहुत आती है / यादें तेरी या उन लम्हों की जो बिताये थे तेरे साथ बचपन में /आज भी ताजा हैं वे याद पचपन में /दोस्त तेरी याद बहुत आती है / स्कूल से गोल मार अमरूद के बगीचे में /दौड्ते दौड्ते जामफ़ल तोडते / माली का डर भी मन में भरा हुआ / पेड
 
प्रदीप मानोरिया
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बैंगलोर में मार-कुटाई की बातें

दो लोग मेरी जिंदगी में ऐसे भी हैं जिन्हें देखते ही धमाधम मारने का बहुत मन करने लगता है.. पता नहीं क्यों.. एक को तो अबकी पीट आया हूं और दूसरे को धमका आया हूं कि जल्द ही आऊंगा, मार खाने को तैयार रहना.. यह मत सोचना कि लड़की समझ कर छोड़ दूंगा.. :) ये दोन
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मैत्रीदिनाच्या निमित्ताने...

आज "World Friendship Day"...आपल्या भाषेत, ’मैत्रीदिन’. पाश्चिमात्य लोकांचे एक चांगले असते, ते कुठल्याही गोष्टीचे ’साजरीकरण’ करतात. (celebration ला आणखी चांगला शब्द आहे का?) आपल्याकडेही या गोष्टी आजकाल लगेच उचलल्या जातात. आता ही उचलेगिरी चांगली का वाईट
 
आशु्तोष मुजुमदार
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एक आंसू गिरा उसकी आंख से....

वो ही रेलवे स्टेशन, वो ही रेलगाड़ी, पर कुछ बदलाव था इस बार। फर्क इतना था कि कभी इस गाड़ी से मैं आया था, और आज इस गाड़ी से कोई जा रहा था। जैसे परिंदे दाने चुगने के बाद अपने घरों की तरफ चल देते हैं, वैसे ही एक परिंदा आज यहां से उड़कर अपने घर जाने को तैयार था,
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