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भाषा प्रवाह मतलब “मन का रेडियो बजने दे ज़रा!”

वैचारिक प्रवाह लहर है उसकी अपनी गतिक ऊर्जा है जिसमे बहना होता है! फ़िर जब शब्दों और भावों का कनेक्शन जुड जाता है – अभिव्यक्ति का बल्ब का जल जाता है. फ़िर उसमे आप बाकी तानें-मुरकियां (रस/उपमाएं/अलंकार) मिला सकते हैं. मैने भी की हैं कुछ कोशिशें.
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चिट्ठाचर्चा: ये दुरूह आत्मपीडक कर्म कर कैसे लेते हैं आप?

आज जब चिट्ठाचर्चा की तुलना देसीपंडित से करता हूं तो पाता हूं कि आज अंग्रेजी वालों के पास भी इसकी टक्कर का कोई उपक्रम मौजूद नही है!
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पठनीयता, लोकप्रियता, रुचि और विषयों की जानकारी देती फ़ीड आधारित साईट!

खुशी हो रही ये देख कर की हिंदी ब्लागर्स नये अनुप्रयोगों और जुगतों को अपनाने में बिल्कुल झिझक नहीं रहे – पिछली पोस्ट में एप्चर के बारे में बताने के बाद जैसी अप्रत्याशित प्रतिक्रियाएं मिलीं हैं – दिल बाग-बाग हुआ है. आज की पोस्ट है एक और धां
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शुक्रिया अभिनव!

मैंने बीज़िंग ओलंपिक्स का उद्घाटन समारोह नहीं देखा. कन्नी काट रहा था. वहां पहुंचे कुछ टेनिस खिलाडियों को छोड किसी का नाम तक नहीं पता मुझे. अभिनव बिंद्रा का नाम भी मुझे २ घंटे पहले पता चला है. सो कर उठा और लो, एक आम सुबह, समाचार देखते ही अभिवन हो गई! अ
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सौ या अधिक चिट्ठा-प्रविष्टियां लिख चुके नये चिट्ठाकारों के लिये

सौ या उस से अधिक चिट्ठा प्रविष्टियां लिखे चिट्ठाकारों ने कुछ महत्वपूर्ण परिस्थितियों का समाना जरूर कर लिया होगा – यह पोस्ट कुछ साझा समस्याओं और उनके निदान के बारे मे है – आशा है कि इन्टरनेट पर नये सक्रिय हुए हिंदीभाषी मित्रों के किसी काम आएगी. (१) प्
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हिन्दी दिवस: अंग्रेजी कुंजीयों से हिन्दी लिखने की चुनौतियाँ व हिंग्लिश घुसेड परिवर्तक की जरूरत!

इस लेख में मै प्रयास करुंगा कि तकनीकी/गैर तकनीकी और प्रदाता/प्रयोक्ता जैसे भिन्न दृष्टीकोणों में संतुलन बिठा कर हिन्दी चिट्ठाकारों को कुछ काम की जानकारी दे सकूं. “यदि आपको लगता है कि समस्या का हल आसान है तो आप उसे समझे ही नही” हिन्दी चिट्ठाकारी को बढ
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प्रस्तुत है टंकी चालीसा और टंकी नामावली भी!

॥ टंकी चालीसा ॥ नमो नमो टंकी टंकारिनी। नमो नमो सनकी धारिनी ॥ धाई चढे सब सीढी तेरी। दारू,वीरू मौसी मती फ़ेरी॥ सब पर भारी टंकी माई। उतरे वीरू बसन्ती पाई॥ तेरी शरण होली गाई। गब्बर की फिर बैंड बजाई॥ व्यथा विवाह की वीरू बोले। उस प्रताप से बनगी शोले॥ तुझ बि
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हिन्दी तेरा रूप अनूप- श्रीलाल शुक्ल

पिछले लेख में बात शुरू हुई थी जनभाषा से और फ़िर वह सरकायी , धकेली जाती हुयी हिन्दी, संस्कृति, अंग्रेजी , मैकाले, फ़ैकाले होते हुये बरास्ते संस्कृति और विनम्रता आदि होते हुये हिन्दी दिवस पर जाकर खड़ी हो गयी। इसी सिलसिले में मुझे श्रीलाल शुक्लजी का एक लेख
 
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जीतू- जन्मदिन के बहाने इधर उधर की

जीतेन्द्र आज नौ सितम्बर है। जीतेन्द्र का जन्मदिन आज के ही दिन पड़ता है। वे भी हमारी तरह सितम्बरी लाल हैं। कहते हैं कि सितम्बर में पैदा हुये लोग कलात्मक प्रतिभा से युक्त होते हैं। लेकिन जीतेन्द्र को देखकर लगता नहीं कि वे उन पर इस सितम्बरी प्रदूषण का को
 
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मुझको बड़ा आदमी बनना है

लड़की वैसाखियों के सहारे धीरे-धीरे चलती है। आहिस्ता, आहिस्ता सीढ़ियां उतरती है। पहले एक पैर नीचे रखती है फ़िर आहिस्ते से दूसरा। सीढ़ियां उतर कर छुटकी सी लड़की उचक-उचककर बैसाखियों के सहारे सड़क पर चलती चली जाती है। लड़की एक दिन कारीडोर में दिख जाती है। बतिया
 
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…जन भाषा के हायपर लिंक

भाषा ज्ञानजी की पोस्ट सुबह-सुबह देख रहे थे। जानकारी दिहिन हैं रेल की-डरते-डरते। हम टिपियाये- “सुन्दर। हम भी कटियाज्ञानी हो गये। कटियाज्ञानी बोले तो जैसे कि आपके ब्लाग पर ज्ञान करेंट बह रही थी हम उसमें कटिया फ़ंसा के सप्लाई ले लिये। सब ले रहे हैं
 
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….ब्लाग की लाज बचाना बेटा

समीरलालजी कल समीरलालजी नेट पर मिले। बोले -भाई साहब हम आपसे बात नहीं करेंगे। आपसे नाराज हैं आप आजकल हमसे मौज नहीं लेते। यह कहते हुये वे बहुत देर तक बात करते रहे। हमने कहा ऐसा क्या हुआ जो आप बात न करते हुये हमारा घंटा खराब कर दिये। वो बोले आजकल आप हमसे
 
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सुनि प्राब्लम चेलाराज की , गुरुवर भये फ़ौरन ही हलकान

आज शिक्षक दिवस है। लोग कहते हैं कि शिक्षा का स्तर गिर गया है। पतित हो गयी है शिक्षा व्यवस्था। हर तरफ़ ट्यूशन का बोलबाला है। जितने मुंह उससे चार गुनी बातें! हर जागरूक व्यक्ति का हर मामले में कुछ न कुछ “मेरा तो यह मानना है” रहता है । जागरुक
 
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गर्मी का सौन्दर्य वर्णन

गर्मी की अब चला-चली की बेला है। कुछ दिन में गर्मी अपना चार्ज बारिश को देकर चली जायेगी । बारिश शपथ ग्रहण के लिये कसमसा रही है। गर्मी से मौसम की सत्ता बारिश को हस्तांतरित होने के बाद फ़िर बारिश का जलवा होगा। नाले-नालियां उफ़नायेंगे। सूखा राहत कोष में बंट
 
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उन दुआओं का मुझपे असर चाहिए

आज कुछ पसंदीदा रचनायें पेश हैं। संयोग यह है कि आज इन कविताओं के रचयिताओं का जन्मदिन है। नन्दनजी अपनी स्वास्थ्य संबंधी तमाम जटिलताओं के बावजूद सृजनरत हैं । प्रियंकर जी को हमें पिछले कई महीनों मिस करने का ही सौभाग्य मिला है। आज हालांकि उन्होंने रचनात्म
 
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जींस-टाप, फ़ादर्स-डे और टिप्पणी-चिंतन

जींस-टाप में उभार दिखते हैं हर साल की तरह इस वर्ष भी कानपुर के कुछ बालिका विद्यालयों में ड्रेस कोड का हल्ला मचा। ऐसा हर साल जुलाई में होता है। लड़कियां ये पहनेंगी वो नहीं पहनेंगी। मोबाइल नहीं लायेंगी और इसी तरह की हेन-तेन। शहर के अखबारों में बयानबाज
 
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ट्विटर,फ़ीड और खामोशी

ट्विटर, हटमल और फ़ुरसतिया : ट्विटर के बारे में सुनते तो बहुत आये थे और अपसे साथ के तमाम साथी ब्लागर उधर पहले से ही मौजूद थे। आलोक तो शायद अब ब्लागिंग पार्टी छोड़कर ट्विटर पार्टी ही ज्वाइन कर चुके हैं। सच तो यह है उनकी पोस्टें शुरू से ही ट्विटर के फ़ार्म
 
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शंकरजी अंग्रेजी सीख रहे हैं

तीन साल पुरानी पोस्ट की रिठेल। जनता भी भोले भंडारी की तरह है। ] शंकरजी बोले तथास्तु विष्णुजी बहुत देर तक नारद जी की राह देखते रहे। लेकिन नारदजी पुराने हिंदी ब्लागरों की तरह नजर से गायब थे। बहुत देर तक सोचते रहने के बाद जब कुछ भी समझ में नहीं आया तो उ
 
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फ़टाफ़ट क्रिकेट और चीयरबालायें

आई.पी.एल.-२ निपट चुका है। पिछली बार की फ़िसड्डी टीमें फ़ाइनल में भिड़ीं। इससे आप अनुमान लगा सकते हैं कि अगली बार शाहरुख खान फ़ाइनल में हलकान दिखेंगे। हमने भी क्रिकेट मैच देखे कुछ। हमारे मैच देखने का कारण जितना मैच के खिलाड़ी रहे चीयरबालायें उससे कम नहीं र
 
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जिसे देखो वह नखरे दिखा रहा है

आजकल जिसे देखो नखरा दिखा रहा है। वोटर, राजनीतिक पार्टियों का तो खैर काम ही नहीं चलता बिना नखरे के लेकिन पिछले हफ़्ते से हमारी ई ब्लाग साइट नखरे दिखा रही है। कोई पोस्ट करो बताती हैं- गलती है। अब बताओ काम साइट न करे और ऊपर से गलती है। चोरी-चोरी ,सीना जो
 
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भैया मत न भये दस-बीस

कल चुनाव का तीसरा दौर पूरा हो लिया। दो तिहाई से अधिक सीटों पर चुनाव हो गये। भीषण गर्मी और उदासीनता के चलते मतदाता गुम्म-सुम्म बने रहे। कल कानपुर में केवल 39 फ़ीसदी मतदान हुआ। तमाम लोगों के वोट देने के आवाहन के बावजूद। जनप्रतिनिधि अपने-अपने इलाके से वो
 
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जनप्रतिनिधि के दर्द

आजकल चुनाव का मौसम चल रहा है। कुछ दिन और चलेगा। जनप्रतिनिधि जनता से जुड़ने का प्रयास कर रहे हैं। जनता के बीच जा रहे हैं। जनता की तरह रह रहे हैं। जनता की तरह कह रहे हैं। जनता की तरह कह रहे हैं मतलब जिस तरह जनता बोलती है उसी तरह बोल बतिया रहे [...] SHAR
 
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मेरे मन उदास मत होइयो

मेरे मन उदास मत होइयो, जगह मिले जहां धंसि जैइयो। टिकट हित चरनन में बिछि जैइयो, फ़िरौ मिले न दूसरे दल भगि जैइयो। वहां अपनी सब पीड़ा कहि देइयो, टिकट पाइ चुनाव लड़ि जैइयो। तबहूं न मिलै तो निर्दलीय भिड़ि जैइयो, लटका-झटका सब धांस के देखिइयो। मंह में राम बगल छ
 
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रंग बरसे भीगे चुनर वाली

होली आई और चली गयी। बहुत सारा मौज -मजा हो गया। मौज मजे के लिये बाहरी ताम-झाम की भी जरूरत पड़ती है। सो एक गाना जो हर चौराहे , गली-मोहल्ले, कोने-अतरे में बजता सुनाई दिया वह था- रंग बरसे भीगे चुनर वाली। जहां रंग चल रहा था वहां भी चुनर वाली भीग रही थी जहा
 
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कम से कम तुम ठीक तरह मरना

लेकिन मरे तो वे सिफ़लिस से अनिल रघुराज के ब्लाग पर रोचक बहस छिड़ी दिखी। वहीं पता चला कि लोगों ने बताया कि नेहरू / लेनिन बहुत महान थे लेकिन मरे तो सिफ़लिस से। सिफ़लिस यौन रोग जनित एक बीमारी होती है जो शायद अनेक लोगों से यौन संसर्ग के कारण होती है। नेहरू
 
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ई कोई नया फ़ैशन है का जी?

आज सुबह पांच बजे से उठकर तमाम पोस्टें बांच डालीं। अब आठ बज गये। लेटे-लेटे बांचते रहे, टिपियाते रहे। टोटल टाइम वेस्ट। बीच में बच्चे को स्कूल की बस में बैठा कर आये। बच्चा कोट को कमीज की तरह मोड़ कर कोहनी तक समेटे है। कल से ऐसा देख रहे हैं। पूछा- क्या गु
 
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एक ठो ओबामा इधर भी लाओ यार

कल हम बराक ओबामा के शपथ ग्रहण के बाद के कुछ किस्से देख रहे थे। शरमाते हुये से शपथ के लिये आगे जाते ओबामा। बाइबल पर शपथ लेने के लिये रखे हाथ की अंगूठी। शपथ लेने के बाद ओबामा की बच्ची का विजयी भाव में अंगूठे का विजयी निशान दिखाती उसकी बच्ची। फ़िर पत्नी
 
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हादसे राह भूल जायेंगे

पिछली पोस्ट पिछले साल लिखी थी। १९ दिसम्बर को। इस बीच साल निकल गया। न जाने कित्ते शुभकामना सन्देशों का आदान-प्रदान हो गया। कई उधारी में पड़े हैं। सबके जबाब देने हैं। रोज सोचते हैं आज लिखेंगे, कल लिखेंगे। लिख नहीं पाते। कोई नाराज होगा तो मना ही लेंगे। य
 
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अहसास का घर

हर सुबह को कोई दोपहर चाहिए, मैं परिंदा हूं उड़ने को पर चाहिए। मैंने मांगी दुआएँ, दुआएँ मिलीं उन दुआओं का मुझपे असर चाहिए। जिसमें रहकर सुकूं से गुजारा करूँ मुझको अहसास का ऐसा घर चाहिए। जिंदगी चाहिए मुझको मानी* भरी, चाहे कितनी भी हो मुख्तसर, चाहिए। लाख
 
कन्हैयालाल नंदन
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