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मन के भय

समय कभी ऐसे भी रंग दिखाता है कि खुशियों से भरे क्षण भी पूरा सुकून नहीं ला पाते| मन अन्दर ही अन्दर चौंकता रहता है, एक भय सा बैठ जाता है मन में ऐसा लगने लगता है जाने कब ठंडी बयार के झौंके बहने बंद हो जायेंगे और निराशाएं, कुंठाएं हमेशा की सिर उठा सामने
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स्वयं की बुराइयों का भय

मन डरता है गुलाब के उस फूल की भाँति जिसे भय हो कि जब उसे चाहने वाला उसे छूने लगेगा तो उसके हाथों में कहीं काँटे न चुभ जायें