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अटल बिहारी वाजपेयी : कवि की व्यथा

सूर्य गिर गया अन्धकार में ठोकर खाकर भीख माँगता है कुबेर झोली फैलाकर कण कण को मोहताज कर्ण का देश हो गया माँ का अँचल द्रुपद सुता का केश हो गया
 
स्वार्थ